'पाकिस्तानी परमाणु जखीरे ने रोका भारत से युद्ध' (लीड-1)

वाशिंगटन, 3 सितम्बर (आईएएनएस)। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक कुख्यात परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान का कहना है कि उनके देश के परमाणु जखीरे ने भारत के साथ परंपरागत युद्ध को रोका और देश के सम्मान को कायम रखा।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु सामग्री की कालाबाजारी करने के आरोपी खान ने पत्रिका 'न्यूजवीक पाकिस्तान' के उद्घाटन अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में कहा, "हमारे परमाणु कार्यक्रम ने हमारी संप्रभुता, सुरक्षा और अस्तित्व को सुनिश्चित किया। मुझे गर्व है कि सक्षम सहयोगियों और अपनी देशभक्ति के साथ मैंने इसमें सहयोग दिया।"

ज्ञात हो कि खान ने 2004 में ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को परमाणु तकनीक उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। बाद में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उन्हें माफी दे दी थी, मगर अमेरिकी दबाव में उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था। लेकिन इस्लामाबाद ने खान से पूछताछ करने की अमेरिका को अनुमति नहीं दी थी।

उन्होंने कहा कि वह अधिकतर पाकिस्तानी लोगों के इस विचार से सहमत हैं कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम होने के कारण भारत के साथ परंपरागत युद्ध के खतरे से बचाव हुआ है।

पाकिस्तान के पास कोई स्थायी पहचान नहीं होने संबंधी लोकप्रिय सिद्धांत के बारे में पूछे जाने पर खान ने कहा, "पाकिस्तान कृत्रिम रूप से बना कोई देश नहीं है। हम मुस्लिम लोग अपनी एक विशिष्ट संस्कृति, इतिहास, सामाजिक व्यवस्था और विरासत के कारण भारत में ही एक अलग राष्ट्र थे।"

उन्होंने कहा, "किसी भी परिभाषा के पैमाने पर हम राष्ट्र थे। दुर्भाग्यवश, स्वार्थी, संकीर्ण मानसिकता वाले नेताओं ने हमें जातीय समूहों में बांट दिया, जिससे शोषण बढ़ा। परमाणु हथियार ने देश को गर्व से आगे बढ़ने लायक बनाया।"

पश्चिमी देशों की पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को गलत हाथों में पड़ने संबंधी खतरे की आशंका को खारिज करते हुए खान ने कहा, "एक अच्छा या खराब परमाणु हथियार बहुत जटिल और परिष्कृत उपकरण है। ऐसे उपकरण को बनाने के लिए काफी अधिक हिस्सों और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। अनपढ़ और अप्रशिक्षित आतंकवादियों की बात तो छोड़िए, बिना उपयुक्त अनुभव के वैज्ञानिक और इंजीनियर भी इसे बनाने में सक्षम नहीं हैं।"

अफगानिस्तान युद्ध को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के लिए वरदान बताते हुए खान ने कहा कि पश्चिमी देशों ने परमाणु कार्यक्रम में सक्रिय सहयोग नहीं दिया। लेकिन वे अफगानिस्तान में रूस की उपस्थिति से इतने भयभीत थे कि उन्होंने इसका सक्रिय विरोध नहीं किया।

खान ने दावा किया, "1990 तक न तो अमेरिका को हमारे परमाणु कार्यक्रम के बारे में भनक लग पाई थी और न ब्रिटेन को ही।"

खान ने कहा कि अफगान युद्ध के बाद अमेरिका व ब्रिटेन ने बेनजीर भुट्टो की सरकार से रियायत हासिल करने के लिए पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान और तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल असलम बेग ने उनके नापाक इरादों को ध्वस्त कर दिया।

खान ने कहा, "पश्चिमी देशों ने ही बाकी दुनिया को डराने के लिए 'इस्लामी बब' जैसे शब्द को उछाला था और मुसलमान व पाकिस्तान को आतंकी के रूप में पेश किया था, जिन्हें 'परमाणु बम' के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए था, क्योंकि पश्चिमी दुनिया मुसलमानों को कोसने और इस्लाम व उसके सुनहरे मूल्यों का मजाक उड़ाने में एकजुट है।"

खान ने अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों पर दो पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों को रिश्वत देने तथा खरीदने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दोनों वज्ञानिकों ने किसी भी तरह का प्रोत्साहन स्वीकार करने से इंकार कर दिया था और उसके बारे में दोनों ने खान को सूचित किया था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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