इराक़ में अनिश्चय से हिंसा तेज़

इराक़ में जुलाई का महीना पिछले दो साल में सबसे अधिक हिंसक महीना रहा. इस दौरान 535 लोग मारे गए और एक हज़ार लोग घायल हुए.
समझा जा रहा है कि इराक़ में चरमपंथी मार्च में हुए अनिर्णायक चुनाव के कारण पैदा हुए राजनीतिक शून्य का इस्तेमाल कर अपनी स्थिति मज़बूत कर रहे हैं.
इराक़ में चुनाव के बाद से लगातार हमलों में तेज़ी आ रही है.
वहाँ पिछले दो वर्षों में, उससे पहले के वर्षों की तुलना में हिंसा में कमी आई थी.
वर्ष 2006 और 2007 में इराक़ में शिया-सुन्नी संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे.
लेकिन इस वर्ष सात मार्च को हुए चुनाव के दिन से ही हिंसा में तेज़ी आई है जिसमें सबसे अधिक मौतें जुलाई के महीने में हुईं.
दो सप्ताह पहले बग़दाद में एक आत्मघाती हमले में 43 लोग मारे गए थे जब सरकार समर्थक एक सुन्नी गुट के लोगों पर तब हमला हुआ जब वे वेतन लेने के लिए क़तार में खड़े थे.
पिछले सप्ताह कर्बला शहर के नज़दीक दो कार बम धमाकों में 19 लोग मारे गए थे. हमला ऐसी सड़क पर हुआ जिसका इस्तेमाल शिया श्रद्धालु करते हैं.
अनिश्चय
इराक़ में चुनाव के बाद शिया, सुन्नी और कुर्द गुटों के बीच प्रधानमंत्री के पद को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है.
निवर्तमान प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी और पूर्व प्रधानमंत्री इयाद अलावी – दोनों ही भावी सरकार के नेतृत्व का दावा कर रहे हैं.
चुनाव में इयाद अलावी की धर्मनिरपेक्ष सुन्नी इराक़िया गठबंधन को 91 सीटें मिली थीं.
अलावी के गठबंधन को नूरी अल मलिकी के शिया बहुत गठबंधन से केवल दो सीटें अधिक मिली हैं.
सरकार बनाने के लिए किसी भी गुट के पास 163 सीटें होनी चाहिए और इसका अर्थ ये है कि सरकार बनाने के लिए किसी प्रकार के व्यापक गठबंधन की आवश्यकता होगी.
ऐसी आशंका जताई जा रही है कि राजनीतिक अनिश्चय के कारण अमरीका के 50 हज़ार सैनिकों के अगस्त के अंत तक देश वापसी की योजना में बाधा आ सकती है.
योजना के तहत वर्ष 2012 तक सारे अमरीकी सैनिकों की इराक़ से वापसी होनी है.












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