बिहार विधान सभा में हंगामा या लोकतंत्र का चीरहरण
आखिर ये विधायक कहना और करना क्या चाहते हैं। न तो इन एमएलए को अपना होश है और न ही देश की गरिमा का ख्याल। इनमें से आधे विधायक शादी-शुदा और परिवार वाले हैं ।जरा सोचिए कुर्सियां फेंकते और गमला तोड़ते इन विधायकों को अगर उनके अपने घरवाले देखेंगें तो क्या यह नहीं कहेंगे कि आप अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। जवाब हां में ही मिलेगा।
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लोकतंत्र और सत्ता को अपनी बपौती समझने वाले ये नेता आखिर कहना क्या चाहते हैं। क्या वो ये सोचते हैं कि इस तरह की दादागिरी, उपद्रव और अमर्यादित व्यवहार से वो लोगों की समस्या और घोटालों का खुलासा कर पायेंगे। नहीं इस तरह से कुछ भी हासिल नहीं होगा क्योंकि बेशर्मी के इस तांडव से विधायक मुद्दों को सुलझाना ही नहीं चाहते हैं बल्कि वो तो आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ये कदम उठा बैंठे हैं।
क्योंकि विपक्ष के पास हमेशा एक कारगर हथियार होता है सत्ता या सरकार की नाकामयाबियों को जगउजागर करना , सो विपक्ष ने पुराना लेकिन कारगार उपाय को नये ऱूप में पेश कर डाला ये बात और है कि ये उपाय बेहद ही भद्दा और अमर्यादित है।
लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं का चीर हरण करना जरूरी है? जब उच्च न्यायालय कथित ट्रेजरी घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दे ही चुका है, तब विपक्ष भावनात्मक आवेश के तर्क से भी सदन में अपने अमर्यादित आचरण को जायज नहीं ठहरा सकता। कहते हैं जब बात करने से बात बनती है लेकिन क्या यहां विपक्ष ने बात की जगह गाली और तर्को की जगह हाथापाई नहीं करना शुरू कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि बिहार में जो हुआ है वो पहली बार हुआ है, इससे पहले यूपी, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं में इस तरह की शर्मनाक हरकतें हो चुकी हैं। लेकिन समाधान कभी खोज नहीं गया जिसका नतीजा है कि ये हरकतें बढ़ती ही जा रही हैं।
अगर जल्द ही ऐसे तांडवी नेताओं पर लगाम नहीं कसी गई तो अभी तो ये सबकुछ विधानसभा के अंदर हो रहा है, आने वाले दिनों में उदंडता का ये नंगा नाच देश के हर गली-मुहल्लों में होगा क्योंकि हमारा देश नेताओं के भरोसे हैं और नेताओं का असल रूप आपके सामने हैं, जो बेदह शर्मनाक और अमर्यादित है।













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