ब्रिटेन,जापान में कटौती, अमरीका चिंतित

जापान, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे दुनिया के संपन्न देश अपने बजट घाटे में कटौती के लिए कड़े कदम उठाने जा रहे हैं. लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इन कटौतियों के समय पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि यदि ये कटौतियां बहुत जल्दी हुईं तो दुनिया फिर से मंदी की ओर जा सकती है.
मंगलवार को ब्रिटेन के चांसलर ऑफ़ दी एक्सचेकर या वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबर्न एक आपातकालीन बजट पेश करने जा रहे हैं.
माना जा रहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बजट घाटे में कमी के लिए ये खर्चों में सबसे बड़ी कटौती की घोषणा होगी.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन है कि ब्रिटेन का इस साल का बजट घाटा दूसरे संपन्न देशों के मुक़ाबले राष्ट्रीय आय का कहीं बड़ा हिस्सा है. एक आयरलैंड ही है जिसके बजट घाटे का अनुपात ज़्यादा है.
यूरो ज़ोन के दूसरे देशों में भी सहमति है कि लगातार बढ़ते बजट घाटे को स्थिर करने की ज़रूरत है.
इनमें कर्ज़ संकट झेल रहे देश ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल का नंबर तो सबसे आगे है लेकिन यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी भी अपने खर्चों में कटौती की बात कर रहा है.
उधर जापान के नए प्रधानमंत्री ने आर्थिक सुधारों को अपने एजेंडा पर सबसे उपर रखते हुए अपने कर्ज़ों में कमी लाने की बात की है.
जापान का राष्ट्रीय कर्ज़ उसके सकल घरेलू उत्पाद को 200 प्रतिशत है जो औद्दोगिक देशों में सबसे ज़्यादा है.
प्रधानमंत्री नौटो कैन ने कहा है कि यदि कर्ज़ों पर ब्रेक नहीं लगाया गया तो देश की अर्थव्यवस्था ग्रीस की तरह चरमरा सकती है.
सरकार ने इसके लिए अपने खर्चों और कर्ज़ों दोनों ही की सीमा तय कर दी है.
सरकार का ज़्यादातर कर्ज़ जापानियों के पास ही है लेकिन जैसे जैसे लोग रिटायर होंगे और अपने पेंशन खर्च करने लगेंगे तो सरकार पर दबाव बढ़ेगा.
आर्थिक मंदी ने पूरी विकसित दुनिया में ख़ासा नुकसान पहुंचाया है.
मंदी से उबारने के लिए सरकारों ने जो पैसा डाला, राहत पैकेजों का एलान किया उससे उनके कर्ज़ों में और बढ़ोतरी हुई.
लेकिन विश्व मुद्रा कोष का कहना है कि समस्या की सबसे बड़ी वजह है आर्थिक गतिविधियों में कमी जिससे देशों की आय में कमी आई.
और अब जब संपन्न देश अपने खर्चों में कटौतियों की बात कर रहे हैं तो उसपर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनती नहीं नज़र आ रही.
अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-20 के नेताओं को इस हफ़्ते होनेवाले सम्मेलन से पहले पत्र लिखकर चिंता जताई है कि अगर कटौतियां बहुत जल्दी हुईं तो उससे आर्थिक मंदी का नया दौर शुरू हो सकता है.
ये बहस सही मायने में एक दुविधा पेश करती है.
संपन्न देशों के बढ़ते कर्ज़ों पर लगाम ज़रूरी है लेकिन इससे मंदी से उबरने पर असर पड़ सकता है.












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