माओवादी भारत-नेपाल विद्युत परियोजना के विरूद्ध
इस समझौते के तहत प्रस्तावित सप्त कोसी बहुउद्देश्यीय परियोजना से 3,300 मेगावॉट जल विद्युत उत्पादन तथा नेपाल और बिहार के बड़े इलाके की सिंचाई हो सकेगी। पूर्व माओवादी छापामारों ने इस परियोजना को नेपाल और नेपाल के जनजातीय तथा उस इलाके मूल निवासियों के हितों के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया है।
रविवार को माओवादी पार्टी के मुखपत्र 'जनदिशा डेली' में कहा गया है, "जब तक जनता इस परियोजना को मंजूर नहीं करती, तब तक हम इस परियोजना का काम नहीं चलने देंगे।"
मुखपत्र के मुताबिक कुछ जातीय समुदायों किरात याकथुंग और किरात राय यायुक्खा जातियों द्वारा भी इस परियोजना का विरोध किया जा रहा है।
शनिवार रात को पार्टी की केंद्रीय समिति के प्रह्लाद बुधातहोकी सहित माओवादियों के एक दल ने परियोजना स्थल पर पहुंच कर यहां मौजूद अधिकारियों को काम करने से रोक दिया।
अधिकारियों के दल का नेतृत्व भारतीय इंजीनियर राकेश कश्यप कर रहे थे। माओवादियों ने कश्यप को काम रोकने के लिए एक ज्ञापन दिया।
भारत और नेपाल के बीच कोसी नदी की बाढ़ रोकने, बहुद्देशीय परियोजनाएं बनाने, सिचाई सुविधाएं बढ़ाने आदि मुद्दों पर 1940 के बाद से ही लगातार बातचीत होती रहती है।
जनजातीय समूह अपने गांवों के डूबने की आशंका के चलते इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
पूर्वी नेपाल के बिराटनगर में 2004 में इस परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक कार्यालय शुरू किया गया था लेकिन नेपाल में सुरक्षा हालात ठीक नहीं होने से यह काम पूरा नहीं हो सका था।
मार्च में नेपाल सरकार ने भारत से कहा था कि सुरक्षा एजेंसियां काम में मदद करेंगी।
इससे पहले जीएमआर के 250 मेगावॉट विद्युत उत्पादन क्षमता के अपर मारस्यांगदी जल विद्युत परियोजना के काम को माओवादियों ने फरवरी में रोक दिया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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