रंगमंच की उज़रा बट्ट को अंतिम विदाई

रंगमंच की उज़रा बट्ट को अंतिम विदाई

एक नज़र में अगर उन्हे कोई देखता तो यही कहता, ये तो ज़ोहरा सहगल हैं. लेकिन वो थीं उज़रा बट्ट.

बहनों की शक्ल मिलना कोई अनहोनी बात नहीं है और दोनों अपने मिलने वालों की इस उलझन का ख़ासा मज़ा लूटती थीं.

उनके चाहने वाले उन्हे दक्षिण एशिया की ग्रैंड ओल्ड लेडीज़ या भारतीय उपमहाद्वीप की दो नानियां भी कहते थे. लेकिन एक नानी भारत में और एक पाकिस्तान में.

पाकिस्तान में बसी नानी उज़रा बट्ट अब हमारे बीच नहीं है.

उज़रा बट्ट का 93 साल की उम्र में लाहौर में इंतकाल हो गया है.

उज़रा बट्ट का जन्म 1915 में रामपुर में हुआ था.

उज़रा बट् 1941 में पृथ्वी राज कपूर के संपर्क में आईं और क़रीब दो दशक तक पृथ्वी थियेटर की लोकप्रिय नायिका रहीं. उन्होंने ‘ग़द्दार’,’शकुंतला’,’आहुति’ और ‘कलाकार’ जैसे मशहूर नाटक किये.

ख़्वाजा अहमद अब्बास के नाटक ‘ज़ुबैदा’ में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई जिसे ख़ूब सराहा गया.

उज़रा बट्ट ने पहली बार अपनी बहन ज़ोहरा सहगल के साथ ‘एक थी नानी’ नाटक किया जो भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में खूब लोकप्रिय हुआ.

देहरादून में बच्पन

अक्तूबर 2006 में अजोका थियेटर ग्रुप की मादीहा गौहर के साथ उन्होने देहरादून में ‘दुख का दरिया’ नाटक किया था. उस समय उनकी उम्र 90 के क़रीब पहुंच रही थी.

तब बीबीसी हिंदी की संवाददाता शालिनी जोशी को उनसे मिलने और बातचीत करने का अवसर मिला.

अपने बच्पन के दिन याद करते हुए उज़रा ने कहा था, “आह वे दिन....मेरे वालिद सिखाते थे कि डिसिप्लिन बड़ी चीज है इसे अपनी तबियत में लाओ.”

उन्होने आगे की पढ़ाई दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज में की. उन दिनों वो जमकर टेनिस खेला करती थीं और उस दौर के टेनिस चैम्पियन ग़ौस मोहम्मद ने उनसे मिक्स्ड डबल्स खेलने की पेशकश की थी.

उन्होने बताया कि अगर वो रंगमंच की तरफ़ न जातीं तो टेनिस खिलाड़ी होतीं.

रंगमंच से नाता

रंगमंच से उनका नाता उदय शंकर बैले कम्पनी के माध्यम से जुड़ा. उनकी बहन ज़ोहरा सहगल कम्पनी में एक नर्तकी के रूप में काम करती थीं. लेकिन जब वो बीमार पड़ गईं तो उन्होने उज़रा को बुला भेजा.

फिर 1944 में उज़रा इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन या इप्टा में शामिल हो गईं. और तभी वो पृथ्वी थियेटर के सम्पर्क में आईं.

उन दिनों को याद करते हुए उन्होने कहा था, “मेरे उस्ताद पृथ्वीराज कहते थे, जब तुम्हें कोई रोल मिलता है तो पहले उसे चबाओ, फिर उसे निगल लो और निगलकर भूल जाओ. डायलॉग ख़ुद ब ख़ुद एक रोल की शक्ल अख़्तियार कर लेता है.”

उज़रा बट्ट 1964 में पाकिस्तान चली गईं और वहां भी रंगमंच और टेलिविज़न में अभिनय करती रहीं.

उन्होने 'चक चक्कर', 'दुखिनी', 'दिल दरिया' और 'ताके दा तमाशा' जैसे कई नाटक किए.

पाकिस्तान जाने के बावजूद उज़रा देहरादून आती रहती थीं. आख़िर वहां उनका बचपन बीता था ब्याह हुआ था.

उज़रा को 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी दिया गया.

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