धमाकों के साए में जिरगा जारी

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में धमाकों और फ़ायरिंग के बीच शांति सम्मेलन (जिरगा) जारी है.
सम्मेलन स्थान के क़रीब रॉकेट से तीन हमले किए गए.
अधिकारियों के मुताबिक़ दो हमलावर मारे गए और एक पकड़ा गया.
तीन दिनों तक चलने वाले इस शांति सम्मेलन में राष्ट्रपति हामिद करज़ई अपने मंसूबे के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे जिसके तहत करज़ई हिंसा का रास्ता छोड़ने वाले तालिबान को आर्थिक मदद देना चाहते हैं.
तालिबान ने बाचचीत के न्योते को ठुकरा दिया है और जिरगे में शामिल होने वाले प्रतिनिधियों को जान से मारने की धमकी दी है.
करज़ई ने जैसे ही बोलना शुरू किया, थोड़ी ही दूरी से धमाके और फ़ायरिंग की आवाज़े आने लगी.
करज़ई ने कहा, ''कोई रॉकेट से हमला करने की कोशिश कर रहा है.आप इसकी चिंता ना करें और आगे बढ़ें.''
रॉकेट से कुल तीन हमले किए गए जो कि काबूल के एक विश्वविधालय में जारी बैठक से सिर्फ़ सौ मीटर की दूरी पर गिरे.
बैठक में शामिल अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत स्टीफ़न दी मिसतूरा ने कहा कि रॉकेट गिरने के बाद भी कोई अपनी जगह से नहीं हटा. मिसतूरा ने बीबीसी को बताया कि तीन सौ महिलाएं समेत तमाम लोग अपनी जगह बैठे रहे.
''उनका इशारा साफ़ था, हमें इसकी आदत है.हम इसके लिए तैयार हैं लेकिन हम बैठक जारी रखना चाहते हैं.''
सम्मेलन के आयोजन में शामिल एक अधिकारी फ़ारूक़ वारदक़ ने कहा कि हथियारों से लैस और बुर्क़ा पहने तीन चरमपंथी इस हमले में शामिल थे.
उनमें से दो मारे गए और तीसरा पकड़ा गया . कोई भी प्रतिनिधि घायल नहीं हुआ.
काबूल स्थित बीबीसी संवाददाता मार्टिन पेशेन्स का कहना है कि पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार राष्ट्रपति हामिद करज़ई को जिरगे में ठहरना था लेकिन वो बैठक से चले गए.
तालिबान के एक प्रतिनिधि ने समाचार एजेंसियों को बताया कि जिरगा पर हमले उन्होंने किए हैं.
तालिबान पिछले नौ सालों से वहां की अमरीका समर्थित सरकार का तख़्ता पलटने और एक लाख तीस हज़ार विदेशी सैनिकों को भगाने के लिए लड़ रहे है.
अफ़ग़ान अधिकारियों का कहना है कि जिरगा में लगभग 1600 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं जिनमें क़बाईली नेता, धार्मिक नेता और संसद सदस्य शामिल है.
इन 1600 लोगों की सुरक्षा के लिए 20000 सुरक्षा बल तैनात किए गए है.
संवाददाताओं का कहना है कि जिरगा बुलाने का मुख्य कारण अफ़ग़ान सरकार और पश्चिमी देशों में इस बात का एहसास है कि अफ़ग़ानिस्तान में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए ज़रूरी है कि तालिबान से किसी प्रकार की सहमति बनाई जाए.
हामिद करज़ई ने तालिबान से अपील करते हुए कहा, ''आप सरकार से शांति समझौता करें उसके बाद विदेशी सेना की ज़रुरत नहीं होगी. लेकिन जबतक आप हमसे बातचीत नहीं करेंगे हम विदेशी सेना को नहीं जाने देंगे.''
जिरगा शुक्रवार को इस एलान के साथ ख़त्म होगा कि चरमपंथ को रोकने के लिए क्या क़दम उठाए जाए, किस समूह से बात की जाए और उनसे कैसे संपर्क साधा जाए.
करज़ई अफ़ग़ानिस्तान के संविधान को मानने वाले तालिबान को आम माफ़ी देने और उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने का प्रस्ताव पहले ही दे चुके हैं.
करज़ई कुछ तालिबान के नाम संयुक्त राष्ट्रसंघ की ब्लैक लिस्ट से निकलवाने और शांतिवार्ता की शुरूआत करने के लिए कुछ तालिबान नेताओं को दूसरे इस्लामिक देशों में शरण दिलवाने का प्रस्ताव भी दे चुके हैं.
सम्मेलन से पहले तालिबान ने कहा कि जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते और ये विदेशियों के फ़ायदे के लिए बुलाया गया है.
पूर्व प्रधानमंत्री गुलबदीन हिक्मतयार के नेतृत्व वाले चरमपंथी संगठन हिज़्ब इस्लामी ने भी इस बैठक को निर्रथक कोशिश बताया है.
इस बीच नैटो, अमरीकी और अफ़गान फ़ौज दक्षिणी प्रांत क़ंधार में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अब तक की सबसे बड़ी फौजी कार्रवाई की तैयारी कर रहे है.
इस साल अगस्त तक अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की संख्या एक लाख पचास हज़ार तक हो जाएगी जिसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जुलाई 2011 से सैनिकों को वापस बुलाना शुरू करेंगे.












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