गर्मी ने कम की लीची की मिठास
बिहार लीची के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। परंतु अप्रैल और मई की झुलसाने वाली गर्मी और पछुआ हवाओं ने मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, बेगूसराय, भागलपुर जैसे प्रमुख लीची उत्पान करने वाले क्षेत्रों के उत्पादकों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। एक तो शुरू में गर्मी से बड़ी मात्रा में लीची के फूल झड़ गए और फिर पछुआ हवाओं ने जो बचे फल थे उन्हें झुलसा दिया।
लीची के लिए प्रसिद्ध मुजफ्फरपुर में इस वर्ष 80,000 टन लीची उत्पादन होने का लक्ष्य रखा गया है परंतु इसमें 40 प्रतिशत लीची बर्बाद हो गई है। कृषि विभाग की मानें तो पिछले वर्ष यहां 60,000 टन लीची का उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, जिसे पूरा कर लिया गया था। परंतु इस वर्ष लक्ष्य पूरा कर पाना संभव नहीं है।
मुजफ्फरपुर के जिला कृषि पदाधिकारी वैद्यनाथ रजक ने आईएएनएस को बताया कि इस वर्ष लक्ष्य का 50 प्रतिशत उत्पादन भी होना मुश्किल लग रहा है। वह कहते हैं कि खराब मौसम के कारण 10-15 दिन पूर्व ही लीची के फलों में लाली आने लगी थी और फिर पछुआ हवा ने तो इन फलों को भी झुलसा दिया।
पश्चिम चंपारण में भी 15 से 20 एकड़ में लीची का उत्पादन होता है। आमतौर पर यहां के लीची बाजार 15 मई से गुलजार होने लगते हैं परंतु अभी तक यह बाजार वीरान है। लीची उत्पादक संजीव कुमार बताते हैं कि लीची उत्पादकों के लिए इस वर्ष गर्मी कहर बन गया है। उन्होंने कहा कि खेत में कम्पोस्ट, मंजर बचाने के लिए दवा आदि का भी छिड़काव किया गया परंतु मौसम की मार से वे बच नहीं पाए।
इधर, राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय से सेवानिवृत हो चुके वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रामकुमार प्रसाद सिन्हा कहते हैं कि ऐसा नहीं कि केवल लीची उत्पादक ही इस मौसम की मार झेल रहे हैं। वह कहते हैं कि इस गर्मी ने सभी किसानों को मायूस किया है। उन्होंने कहा कि पिछले साल सूखा पड़ने के लिए गेहूं में दाना पुष्ट नहीं हुआ तो मूंग के खेतों में नमी नहीं होने के कारण पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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