इलाहाबाद में महिलाएं करा रही हैं अंतिम संस्कार

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इलाहाबाद। पुरुषों को हर क्षेत्र में चुनौती दे रहीं महिलाओं ने उत्तर प्रदेश में अंतिम संस्कार कराने का काम भी शुरू कर दिया है। इलाहाबाद जिले के मनैया गांव में महिलाएं दाह संस्कार करवाती हैं। यहां इन्हें 'महराजिन बुआ' के नाम से पुकारा जाता है।

गंगा नदी किनारे मरघट पर महिला पुरोहितों को वैदिक मंत्रोचार के साथ पूरे विधि-विधान से शव की चिता बनाने, अग्नि प्रज्वलित करवाने तथा अस्थियों को बीच नदी में प्रवाहित कराने का कार्य करवाते सहज रूप में देखा जा सकता है।

महिला पुजारी कौशल्या रानी (25) आईएएनएस से कहती हैं, "जब पुरुष यह काम करवा सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं करवा सकतीं। इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं। हम (महिलाएं) भी महापात्रों (दाह संस्कार कराने वाले पुरुष) की तरह ही अंतिम संस्कार का काम करवा सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले दिनों में और भी महिलाएं व्यवसाय के तौर पर महराजिन बुआ का काम अपनाएंगी।"

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वर्तमान में मनैया गांव के सात परिवारों की महिलाओं ने व्यवसाय के तौर पर इस पुरुष एकाधिकार वाले क्षेत्र में उतरकर 'महराजिन बुआ' का काम शुरू किया है। व्यवसाय के तौर पर महिलाओं के इस काम को अपनाने के पीछे कई कारण हैं। ज्यादातर ने घर चलाने और रोजी-रोटी कमाने के लिए इसे चुना तो कुछ ने घर में लड़के न होने के कारण पारिवारिक विरासत के रूप में इसे अपनाया।

28 वर्षीय महिला पुजारी गुड्डन कहती हैं, "मैंने तो दोनों कारणों से इस काम को चुना। मेरे परिवार का यह पुश्तैनी काम था। दो साल पहले मेरे पिता जी जो महापात्र थे, उनका देहांत हो गया। उनकी मृत्यु के बाद मेरे परिवार में कोई पुरुष नहीं था जो इस पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ा सके।"

गुड्डन ने कहा कि पिता जी के देहांत के बाद हम लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर हो गई। कोई भी रिश्तेदार हमारे घर इस डर से नहीं आता था कि कहीं हम उससे पैसे या दूसरी कोई मदद न मांग लें। तब मैंने इसे अपना व्यवसाय बनाने का फैसला किया और आज मैं अपनी मां और दो छोटी बहनों के परिवार का पेट पालती हूं।

इन महिलाओं ने जब दाह संस्कार करवाने के काम को अपनाने का फैसला किया तो शुरुआत में ग्रामीणों, खासकर महापात्रों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। महिला पुजारी राखी कहती है कि शुरुआत में मेरे पड़ोसियों और गांव के कुछ लोगों ने बहुत विरोध किया, लेकिन मैं दृढ़ निश्चय कर चुकी थी। कुछ समय बाद मैं बखूबी इस काम को अंजाम देने लगी।

स्थानीय लोगों के मुताबिक तीन साल पहले महिलाओं के इस क्षेत्र में आने की प्रथा अस्तित्व में आईं। ग्रामीण उद्धव सिंह (50) कहते हैं कि वैसे तो अभी भी मरघट पर आने वाले ज्यादातर शवों का दाह संस्कार महापात्र ही करवाते हैं, लेकिन महराजिन बुआ भी धीरे-धीरे खुद को इस क्षेत्र में स्थापित कर रही हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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