खुफिया विभाग की विफलता नहीं तो और क्या?

पहला सवाल यह कि अगर खुफिया तंत्र मजबूत होता तो यह ब्लास्ट होता ही क्यों। एक बार अगर चिदंबरम की बात मान भी लें, तो साफ है कि खुफिया विभाग ने गृह विभाग को इस संबंध में चेतावनी जरूर दी होगी। भले ही गृह मंत्री को यह बात नहीं याद, लेकिन शनिवार शाम केंद्रहय गृह सचिव जीके पिल्लई ने इस बात की अधिकारिक पुष्टि की थी कि केंद्र ने महाराष्ट्र सरकार को इस बारे में 12 अक्तूबर 2009 को चेतावनी दी थी कि पुणे में आतंकी हमला हो सकता है।
तो फिर गृह विभाग की विफलता
पिल्लई के मुताबिक अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध रहा आतंकी डेविड हेडली पकड़े जाने से पहले पुणे का जायजा ले चुका था। हेडली ने उस ओशो आश्रम का सर्वेक्षण भी किया था, जो जर्मन बेकरी से महज 200 गज की दूरी पर है।
इन बातों को जानते हुए भी चिदंबरम खुफिया एजेंसियों की विफलता नहीं स्वीकार रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि मीडिया के सामने आते ही चिदंबरम पूरी तरह गृह विभाग का बचाव कर रहे हैं। जाहिर है अगर खुफिया विभाग ने सूचना दी थी तो गृह विभाग को उस पर अमल करना चाहिए था।
उद्धव की बात भी सही
गृह विभाग की बात आते ही शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। रविवार की सुबह उन्होंने पुणे बेकरी धमाके के लिए चव्हाण को जिम्मेदार ठहराया। कहीं न कहीं उद्धव की बात भी सही है, जब सारी सुरक्षा शाहरुख खान की फिल्म के सुगमता के साथ रिलीज कराने के लिए सिनेमा हॉल और मल्टीप्लेक्सों को दे दी जाएगी, तो संवेदनशील इलाकों का क्या होगा। वो भी ऐसे में खुफिया विभाग पहले से चेतावनी दे चुका है।
कुल मिलाकर पुणे में हुए बम धमाके ने एक बार फिर भारत की जनता को यह अहसास करा दिया है कि वो खुद सतर्क रहें। क्योंकि सरकार खुफिया विभाग की मजबूती का चाहे जितने ही दावे करती रहे, आम आदमी फिर भी सुरक्षित नहीं रहेगा। वैसे भी चाहे दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद धमाके हों या फिर मुंबई आतंकी हमला हर वारदात के बाद ही पहले से दी गई चेतावनियों की खबरें आती हैं।












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