सूना पड़ा है संसद का पुस्तकालय

नई दिल्ली, 22 दिसम्बर (आईएएनएस)। संसद के दोनों सदनों में भले ही सांसदों की मौजूदगी और उनके हंगामे से रौनक दिखाई देती हो लेकिन संसद का पुस्तकालय एक ऐसी जगह है जहां अक्सर वीरानी छाई रहती है।

पुस्तकालय 55,00 वर्गमीटर मे फैला है लेकिन दोनों सदनो के 790 सदस्यों में चंद ही ऐसे हैं जो इसकी ओर रुख करते हैं। संसद सत्र के दिनों में भी इस पुस्तकालय में चुनिंदा लोग ही नजर आते हैं।

पुस्तकालय के एक कर्मचारी ने आईएएनएस से कहा, "इस पुस्तकालय में बहुत कम लोग आते हैं। मैं देखता हूं कि सिर्फ 10-12 सांसद ही यहां नियमित आते हैं। कभी-कभार लगभग 40 अन्य सांसद भी यहां आते हैं।"

मौजूदा रिकार्ड के अनुसार पुस्तकालय के पास 12.7 लाख से अधिक किताबें, रपटें, संसद की बहस से जुड़े रिकार्ड और गजट हैं। यहां 150 देशी और विदेशी अखबार आते हैं। इसके अलावा अंग्रेजी, हिंदी और अन्य भाषाओं में 587 पत्रिकाएं आती हैं।

संसद के पुस्तकालय की खास बात यह भी है कि यह कोलकाता के राष्ट्रीय पुस्तकालय के बाद यह देश का दूसरा सबसे बड़ा पुस्तकालय है। इसमें हर महीने सैकड़ों किताबें और पत्र-पत्रिकाएं शामिल होती जा रही हैं। ऐसे में जल्द ही यह देश का सबसे बड़ा पुस्तकालय भी बन सकता है। आज से छह साल पहले इस पुस्तकालय परिसर का निर्माण कराया गया था।

पुस्तकालय खुद भी 'पार्लियामेंटरी लाइब्रेरी बुलेटिन' नाम से एक मासिक का प्रकाशन करता है। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की राज्यसभा सदस्य वृंदा करात भी उन चंद सांसदों में एक हैं जो नियमित पुस्तकालय आते हैं।

करात ने आईएएनएस से कहा, "यह पुस्तकालय बहुत उपयोगी है। बहस के बीच में जब भी जरूरत पड़ती है तो पुस्तकालय से हर तरह की सामग्री मिल जाती है।"

ज्यादातर सांसदों के इस पुस्तकालय में न आने के सवाल पर वृंदा ने कहा, "माफ कीजिए, मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकती।" उनका कहना है प्रत्येक सांसद अपने ढंग से पुस्तकों और प्रसंगों का संकलन करता है।

इस सवाल पर भी कोई सांसद नहीं बोलता कि जब सांसदों के पास खुद के पुस्तकालय हैं तो फिर सरकार ने 200 करोड़ रुपये खर्च करके इस पुस्तकालय का निर्माण क्यों करवाया?

इस पुस्तकालय पर प्रतिदिन आने वाले खर्च के बारे में सही जानकारी देने के लिए कोई अधिकारी तैयार नहीं दिखा। एक अधिकारी ने कहा, "मैं नहीं जानता, लेकिन बिजली बिल, कंप्यूटर और रख-रखाव के दूसरे खर्चे एवं कर्मचारियों के वेतन को मिलाकार रोजाना लाखों का खर्च आता है।"

अधिकारियों की एक शिकायत यह है कि कई सांसद किताबों को समय पर नहीं लौटाते। एक अधिकारी ने कहा, "कई सांसद हैं जो किताबें समय पर नहीं लौटाते। परंतु निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश के बाद यह सभी सांसदों के लिए अनिवार्य है कि अगर वे किताबों को वापस नहीं लौटाते तो उन्हें इसके बदले भुगतान करना होगा।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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