कोपेनहेगन में राष्ट्रीय हितों की रक्षा की गई: रमेश (लीड-3)
रमेश ने मंगलवार को राज्यसभा में कोपेनहेगन सम्मेलन के नतीजे पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि इस समझौते से राष्ट्रीय संप्रभुता को किसी भी तरह की ठेस नहीं पहुंची है।
उन्होंने दोहराया कि सम्मेलन के दौरान विकसित और विकासशील देशों के बीच हुआ समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस समझौते को लेकर सभी प्रमुख राष्ट्रों ने अपनी सहमति जताई है।
रमेश ने कहा कि सम्मेलन के दौरान 'बेसिक' देशों के बीच जो नजदीकी तालमेल देखा गया, वह भी एक उपलब्धि है। उल्लेखनीय है कि 'बेसिक' देशों में ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन शामिल हैं।
पर्यावरण मंत्री ने कहा, "बाली एक्शन प्लान (बीएपी) और क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत कोपेनहेगन में जो बातचीत हुई, वह पूरी नहीं हो सकी।" उन्होंने आशा जताई के यह वार्ता अगले वर्ष के आखिर तक पूरी हो जाएगी।
उन्होंने कहा, "सम्मेलन के दौरान भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन इस बात को सुनिश्चित कराने में पूरी तरह सफल रहे कि वर्ष 2007 के बाली एक्शन प्लान का उल्लंघन न हो।"
रमेश ने कहा कि भारत और अन्य 25 देशों को मेजबान देश डेनमार्क की ओर से समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने कहा कि इस समझौते को स्वीकार्य नहीं किया गया क्योंकि इस पर आम सहमति नहीं थी।
उन्होंने कहा, "मैं मानता हूं कि जलवायु परिवर्तन पर वार्ता के दौरान बेसिक देश एक शक्तिशाली समूह के रूप में उभरे। उनकी एकजुटता इस भरोसे के लिए कारगर साबित हुई कि समझौते को बाली एक्शन प्लान और क्योटो प्रोटोकॉल के मुताबिक ही अंतिम रूप दिया जाएगा।"
उधर, उनके बयान के संदर्भो का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता अरुण जेटली सरकार पर जमकर बरसे। जेटली ने इस समझौते को 'अमेरिका-बेसिक' समझौता करार दिया। उन्होंने कहा कि कोपेनहेगन समझौता 'गरीब देशों के साथ एक विश्वासघात' है।
भाजपा नेता ने कहा कि सरकार 'शर्म-अल शेख सिंड्रोम' की चपेट में है और कोपेनहेगन समझौते को देखकर भी यही लगता है। उन्होंने कहा कि समझौता कुछ कहता है और इस पर सरकार की समझ कुछ और है।
उन्होंने कहा, "यह समझौता पूरी तरह से गरीब देशों के साथ विश्वासघात के रूप में प्रतीत होता है।" जेटली ने कहा कि सरकार इस समझौते के दिशा-निर्देशों के भावी नतीजों को स्पष्ट करे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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