4 देशों ने किया कोपेनहेगन समझौते का विरोध (लीड-1)
कोपेनहेगन, 19 दिसम्बर (आईएएनएस)। वेनेजुएला, बोलीविया, सूडान और तुवालू ने कोपेनहेगन में दुनिया के करीब-करीब सभी देशों द्वारा मान्य जलवायु परिवर्तन समझौते का विरोध किया है। भारत और चार अन्य देशों ने इस समझौते का प्रारूप तैयार किया है।
समझौते का विरोध करने वाले चारों देशों ने समझौते को अलोकतांत्रिक बताया क्योंकि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र प्रारूप संधि (यूएनएफसीसीसी) में शामिल सभी 192 देशों ने इस पर चर्चा नहीं की।
समझौते को पूर्ण सत्र में शामिल 25 देशों के प्रतिनिधियों के सामने पेश किया गया लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए।
अमेरिका के सहयोग से भारत और अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं ने शुक्रवार रात समझौते को तैयार किया था।
शुक्रवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ब्राजील, भारत, चीन और अफ्रीका की सरकारों के प्रमुखों से एक घंटे तक चली वार्ता में समझौते का रास्ता साफ किया।
इस बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा मौजूद थे।
एक भारतीय अधिकारी ने बताया कि बैठक में समझौते का प्रारूप तैयार किया गया और इसे 25 अन्य देशों के प्रमुखों और यूरोपीय संघ तथा यूएनएफसीसीसी के सचिवालय ने अंतिम रूप दिया।
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा उसके कुछ देर बाद कहा, "तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के वैश्विक लक्ष्य पर सहमति बनी है। हम अपनी संप्रभुता की हिफाजत के लिए एक पारदर्शी तंत्र पर भी सहमत हुए हैं।"
वह धनी देशों की उस मांग का हवाला दे रहे थे जिसमें कहा गया था कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा पर नियंत्रण ही नहीं करना होगा बल्कि उनके कदमों की अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा पुष्टि भी करानी होगी।
भारत और चीन ने पहले यह कहकर इसका विरोध किया था कि यह उनकी संप्रभुता पर आघात होगा।
शिखर बैठक में गतिरोध कायम करने वाले तीसरे मुद्दे का जिक्र करते हुए रमेश ने कहा कि ओबामा ने बताया कि कुछ यूरोपीय देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक नई कानूनी संधि पर चर्चा करना चाहते हैं। मनमोहन सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब क्योटो प्रोटोकॉल है तो किसी नई संधि पर विचार-विमर्श नहीं होगा।
रमेश ने कहा कि भारत और बीएएसआईसी देश जहां इस समझौते को अच्छा तथा विकासशील देशों के लिए बेहतर मान रहे हैं वहीं जी-77 देशों की राय जुदा है।
हाल के वर्षो में विकासशील देशों का सबसे तीखा मतभेद सामने लाते हुए संयुक्त राष्ट्र में सूडान के राजदूत ने इसे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जारी संघर्ष में सबसे खराब घटनाक्रम बताया।
पूर्ण अधिवेशन शुरू होते ही यह मतभेद उजागर हो गए। ओबामा उससे घंटों पहले रवाना हो चुके थे। उन्होंने अपने साथ यात्रा कर रहे संवाददाताओं से कहा, "यह पहली बार होने जा रहा है जब उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों ने स्वैच्छा से उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। मूलरूप में बदलाव लाया जाना अनिवार्य था। यह इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ होगा।"
ओबामा ने कहा कि कानूनी तौर पर बाध्यकारी संधि अनिवार्य है लेकिन इसे अंतिम रूप देना बहुत कठिन है। उन्होंने कहा, "अगर हम उसकी इंतजार करते रहेंगे तो हम कोई प्रगति नहीं कर सकेंगे।"
लेकिन बहुत से गैर सरकारी संगठन इस समझौते से नाखुश हैं। ग्रीनपीस इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक कुमी नायडू ने कहा, "वैश्विक नेता जलवायु परिवर्तन की आपदा को टालने में नाकाम रहे हैं। सभी स्थानों के लोग शिखर बैठक शुरू होने से पहले से ही यहां वास्तविक करार की मांग कर रहे थे। हम अब भी लाखों लोगों को गरमाती धरती के कारण होने वाली तबाही से बचा सकते हैं।"
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ग्लोबल क्लामेट इनिशिएटिव से संबद्ध किम कारस्टेन्सन ने कहा, "बरसों के विचार विमर्श के बाद हमारे पास एक घोषणापत्र है जो कानूनी तौर बाध्यकारी नहीं है।"
दूसरी ओर कुछ लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं। यूरोपीय संघ ने करार को स्वीकार कर लिया है लेकिन वह इससे प्रसन्न नहीं है। संघ के मौजूदा अध्यक्ष जोस मैनुअल बारासो ने कहा है, "यह सकरात्मक कदम है लेकिन हमारी महत्वाकांक्षाओं से कम है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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