दलबदल विरोधी कानून सांसदों की 'आजादी' पर अंकुश लगाता है ?
देश में आयाराम-गयाराम की राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए 1985 में दल बदल विरोधी कानून लागू किया था। सत्ता में भागीदारी या दूसरे लाभ हासिल करने के चक्कर में अपनी पार्टी को छलने की नेताओं की आदत पर अंकुश लगाने के लिए यह कानून अमल में लाया गया था। कई नेताओं का मानना है कि यह कानून अभिव्यक्ति की आजादी को कुंद करता है। ताजमहल होटल में पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा इस विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में पूर्व सांसद एवं बहुजन समाज पार्टी(बसपा) के महासचिव शाहिद सिद्दीकी ने चुटकी लेते हुए कहा, "इस देश में थोक में वफादारी बदलने की छूट है, पर खुदरा में नहीं। भारत में राजनीतिक पार्टियां अलोकतांत्रिक हैं और वे कुछ खास लोगों या समूहों की गिरफ्त में फंसकर सामंतवादी हो गई हैं। ऐसे पार्टी मुखिया जो खुद संसद में नहीं हैं, यह तय करते हैं कि पार्टी के अमुक नेता संसद में क्या बोलेंगे।"
वक्ताओं में शामिल कांग्रेस सांसद एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील ई.एम.एस नचिअप्पन, पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाई.के सभरवाल एवं प्रख्यात पत्रकार बी.जी वर्गीज भी इस पर सहमत थे कि यह कानून अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित करता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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