अब शुरु होंगी भाजपा की मुश्किलें

भाजपा पहले ही विचारधारा के संकट से जूझ रही है और इसके लिए उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लताड़ा जा चुका है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को स्पष्ट सलाह दी थी कि अब पार्टी नेतृत्व की कमान युवा हाथों में दी जानी चाहिए। भागवत का बयान भाजपा की चिंतन बैठक के ठीक पहले आया है। भागवत ने कहा है कि पार्टी में बडे बदलाव की जरूरत है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता शिमला की वादियों में बुधवार से तीन दिन तक आत्मनिरीक्षण करने जा रहे हैं। जिसमें यह आंकलन किया जाएगा कि पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतर परफार्मेंस क्यों नहीं दिखा सकी।
जसवंत सिंह के साथ-साथ लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार की जवाबदेही तय करने की मांग करनेवाले नेताओं अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा को भी इस चिंतन बैठक से दूर रखा गया है। गौरतलब है कि बीजेपी के सीनियर लीडर लाल कृष्ण आडवाणी जब पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर गए, तब उन्होंने जिन्ना की काफी तारीफ की थी। इसके बाद भी पार्टी में खूब बवाल मचा था और आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष का पद गंवाना पड़ा था। जसवंत सिंह के खिलाफ की गई इस कार्रवाई के बाद असंतुष्टों का एक बडा़ हिस्सा पार्टी फैसलों पर सवाल उठा सकता है। कुछ समय पहले संघ ने इस बात के संकेत दिये थे कि 2005 में आडवाणी की पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना के बारे में उनकी टिप्पणी का अब कोई महत्व नहीं है। तो सवाल यह उठेगा कि यदि आडवाणी की बात को भुलाया जा सकता है तो जसवंत को किस बात की सजा।
जसवंत अपनी किताब में लिखते हैं कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से किनारा कर जिन्ना के विकल्प सीमित कर दिए। 1937 के चुनाव के बाद मुस्लिम लीग को सत्ता में हिस्सेदारी न देना विभाजन का प्रमुख कारण बना। जिन्ना ने पाकिस्तान जीत कर हासिल नहीं किया, बल्कि नेहरू और सरदार पटेल ने पाकिस्तान जिन्ना को दे दिया। इसमें ब्रिटिश सरकार ने दाई की भूमिका निभाई। दिलचस्प यह है कि जसवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई ने पार्टी की अंदरूनी कमजोरी को और खुले रूप में सामने ला दिया। यह बात पहले ही मीडिया की सुर्खिया बन चुका था कि जसवंत सिंह की पुस्तक के कुछ अंशों की जानकारी मिलने के बाद भाजपा आला कमान आशंकाओं से घिर गया है। उन्हें अंदेशा था कि कई दल इस किताब में रखी गई स्थापनाओं के आधार पर पार्टी पर हमला कर सकते हैं।
जसवंत सिंह की किताब लोग दो सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़ना चाहेंगे। पहला सवाल कि क्या जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे? और दूसरा पाकिस्तान के निर्माण में उनका हाथ था? अपनी किताब 'जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन-इंडिपेंडेंस' की प्रस्थापनाओं को सही ठहराते हुए जसवंत का कहना है कि वह उस हर आदमी की तारीफ करते हैं, जो अपना रास्ता स्वयं बनाता है और जो सोचता है, उसके लिए ईमानदारी से काम करता है। जिन्ना एक ऐसे ही इंसान थे। वह एक सेक्युलर मुसलमान थे, जिन्हें नेहरू की कांग्रेस ने धोखा दिया। पुस्तक में यह बताया गया है कि भारत के बंटवारे के लिए अकेले जिन्ना जिम्मेदार नहीं थे। कांग्रेस और संघ विचारधारा के कई लोग भी इसके लिए जिम्मेदार थे।
जसवंत सिंह की किताब पर पिछले दिनों आई नामवर सिंह की टिप्पणी उल्लेखनीय है। बजाय जसवंत सिंह की किताब पर कोई टिप्पणी करने के नामवर सिंह ने हिन्दी की एक किताब का उद्धरण पढ़ा और कहा कि जसवंत की किताब दरअसल इसी पुस्तक की एक कड़ी है। नामवर ने कहा कि जसवंत से पहले एक सेवानिवृत इनकम टैक्स आफिसर ने अपनी किताब में जिन्ना से जुड़े इन्ही सवालों को उठाया था। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास में जिन्ना को एक खलनायक की तरह पेश किया गया था, जो कि सिर्फ एक मिथक है। इस मिथक को तोड़ने के लिए लिए ङी वीरेन कुमार बर्नवाल ने एक किताब लिखी और ठीक उसी क्रम में अब जसवंत सिंह की किताब आई है। वे बोले, 'कर्ण पांडवों का खून था मगर उसे कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा था।'
शायद नामवर सिंह की इस बात का यही मतलब हो कि जिन्ना एक ऐतिहासिक भूल के तहत खलनायक बनाया गया। और वास्तव में जिन्ना एक सेकुलर व्यक्ति थे मगर उनकी नियति में मुसलिम लीग के पक्ष में रहते हुए लड़ना लिखा था। नामवर सिंह ने भावनाओं से ओतप्रोत इस किताब को लिखने के लिए जसवंत सिंह की सराहना भी की। जानेमाने अधिवक्ता राम जेठमलानी ने जिन्ना की किताब की चर्चा चलने कहा कि भारत की सभी समस्याओं की वजह नेहरू हैं। जसवंत सिंह की तारीफ करते हुए जेठमलानी ने कहा कि वे पहले से ही उनके प्रसंशक थे अब यह किताब आने के बाद से वे उनके और ज्यादा मुरीद हो गए हैं।
जैसा कि बताया जाता है कि जसवंत सिंह ने इस किताब में कहा है कि हिन्दुस्तान ने मोहम्मद अली जिन्ना को गलत समझा गया है। वह एक राष्ट्रवादी थे, जिन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरू और कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने अलग पाकिस्तान की बात करने और अंतत: उसे बनाने के लिए बाध्य किया। वैसे देश में प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच जसवंत सिंह की पुस्तक की चाहे जितनी आलोचना हो रही हो, पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों ने जसवंत सिंह की बौद्विक निर्भीकता की तारीफ की है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डान ने इस किताब को लेकर छिड़े विवाद पर लिखा है कि जसवंत की किताब से भारत में जिन्ना के व्यक्तित्व को लेकर नए विमर्श की शुरुआत होगी। यह विमर्श यहां भाजपा के लिए कई सवालों को जन्म देगा, जिनका जवाब देना पार्टी नेतृत्व के लिए भारी पड़ सकता है।


Click it and Unblock the Notifications