आखिर चुनाव के समय ही स्विस बैंक मुद्दा क्यों?

नई दिल्ली, 10 मई (आईएएनएस)। स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के पैसे को वापस लाने के मसले पर केन्द्र में सत्तारूढ़ यूपीए जिस तरह की बयानबाजी कर रहा है, वह बहुत ही अटपटा है। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के इस मसले को चुनाव के समय ही क्यों उठाया जा रहा है। सवाल उठता है कि इस मसले को चुनाव के समय आखिर क्यों नहीं उठाया जाए?

चुनाव के समय यह हमारा दायित्व बन जाता है कि हम लोगों को यह बताएं कि केन्द्र की यह सरकार और इसमें शामिल दल देश के हितों के प्रति कितने ईमानदार हैं। 72 लाख करोड़ से भी ज्यादा धन स्विस बैंकों में जमा हैं, लेकिन केन्द्र सरकार न तो उस धन को लाने में दिलचस्पी ले रही है और न उन लोगों का नाम सामने लाने में दिलचस्पी ले रही है, जिन्होंने देश की दौलत को उन बैंकों में जमा कर रखा है।

राष्ट्रहित से जुड़े इस मसले को चुनाव के समय उठाना इसलिए जरूरी हो जाता है, क्योंकि इस समय लोगों की राजनैतिक चेतना चरमोत्कर्ष पर होती है। इस समय जनता का राजनैतिककरण अपने ऊफान पर होता है। देश की समस्याओं से उन्हें अवगत कराने का इससे बेहतर समय और कोई हो ही नहीं सकता। चुनाव के समय जनता और उसके प्रतिनिधियों का सीधा और गहरा संवाद होता है। ऐसे समय में स्विस बैंक में भारत के जमा धन के मसले को उठाने पर सवाल करना नितांत हास्यास्पद है।

भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई पहली बार चुनाव का का मुख्य मुद्दा नहीं बना है। 1974 का छात्र आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ ही हुआ था। उसके बाद आपातकाल लगा। फिर 1977 का चुनाव इसी के पृष्ठभूमि में हुआ। 1989 में भी भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया गया था। लगता है कि सरकार अतीत से सबक लेने को भी तैयार नहीं है। यही कारण है कि स्विस बैंक में जमा भारत के धन के मसले को उठाए जाने के बावजूद इसे नजर अंदाज कर रही है।

यह तो हम सालों से जानते हैं कि भारत के कुछ लोगों ने अपना काला धन स्विट्जरलैंड व अन्य देशों के बैंकों में जमा कर रखा है, लेकिन 2006 में स्विस बैंकों के संगठन द्वारा आंकड़ा जारी किए जाने के बाद हमारी बेचैनी और बढ़ गई है। उस आंकड़े के अनुसार वहां 72 लाख करोड़ से भी ज्यादा का भारतीय धन जमा है। यह तो 2005-06 का आंकड़ा है। पिछले तीन सालों में यह राशि और भी बढ़ी होगी।

स्विस बैंकों में जितना विदेशी धन जमा है, उसमें आधे से ज्यादा सिर्फ भारत का ही है। यह निश्चय ही सदमा पहुंचाने वाली घटना थी, लेकिन केन्द्र सरकार में बैठे लोगों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। 2008 में अमेरिका तथा कुछ अन्य देशों की सरकार द्वारा मांगे जाने पर उन देशों की सरकारों को वहां के लोगों के जमा धन कि सूचना दी गई और बताया गया कि धन जमा करने वाले कौन लोग हैं।

पर भारत सरकार ने स्विस अधिकारियों से किसी तरह की मांग ही नहीं की। आखिर क्यों? केन्द्र सरकार किन लोगों को बचाना चाह रही है? जिन लोगों के पैसे उन बैंकों में जमा हैं, उनसे केन्द्र सरकार में बैठे लोगों के क्या संबंध हैं? ये सवाल हमें ही नहीं जनता को भी परेशान कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार इन सवालों का जवाब नहीं दे रही और कांग्रेस के नेता हमारे सवालों पर सवाल कर रहे हैं कि चुनाव के समय हम यह सवाल क्यों खड़ा कर रहे हैं।

केन्द्र सरकार को स्विस बैंकों की राशि पर अपनी गंभीरता दिखाने का एक मौका जी-20 के शिखर सम्मेलन में भी मिला था। वहां आतंकवाद और स्विस बैंक पर जमकर चर्चा हुई, लेकिन भारत ने स्विस बैंक में जमा राशि के मसले पर कोई खास गंभीरता नहीं दिखाई, जबकि सबसे ज्यादा भारतीय धन जमा होने के कारण सबसे ज्यादा चिंता भारत को ही दिखानी चाहिए थी। यानी केन्द्र सरकार न तो देश के अंदर स्विस बैंक खातों पर हमारे सवालों का जवाब दे रही है और न ही वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इस मसले को उठाने में दिलचस्पी दिखा रही है। इन बैंकों में जमा धन का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए भी किया जा रहा है, फिर भी भारत की सरकार जी-20 की बैठक में मौन रही, जबकि भारत भी आतंकवाद का शिकार है।

हमारा देश मंदी की चपेट में आ गया है। देश का राजकोषीय घाटा देश की राष्ट्रीय आय का 12 फीसदी तक पहुंच जाने की आशंका है। जाहिर है, सरकारी खर्च बहुत बढ़ गए हैं। मंदी के कारण राजस्व उगाही और नीचे जा सकती है। यानी आने वाले दिनों में राजकोष का घाटा और भी बढ़ सकता है। ऐसे माहौल में स्विस बैंकों में जमा अपने देश का पैसा हमारे बहुत काम आ सकता है। पैसा वापस लाना बाद की बात है, पहले सरकार यह तो पता करे कि वह पैसा किन लोगों का है।

कहने की जरूरत नहीं कि यह पैसा उन लोगों का ही होगा, जो सत्ता में उच्च पदों पर बैठे हुए हैं अथवा कभी इन पदों पर रहे होंगे। उद्योगपतियों के पैसे भी इसमें हो सकते हैं। देश के लोगों को यह जानने का हक है कि ये कौन लोग हैं जो भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाकर भारत के धन को विदेशों में जमा करवा रहे हैं। लेकिन हम उन लोगों के नाम जानने के लिए जितना उत्सुक हैं, सरकार उससे ज्यादा उत्सुक इन लोगों के नाम दबाकर रखने में दिखाई पड़ रही है।

जाहिर है, स्विस बैंक में जमा काले धन से संबंधित जानकारी हासिल कर लोगों को बताने में झिझक दिखाकर सरकार में बैठे लोग देश के प्रति अपनी प्रतिबद्घता से मुकर रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि देश में चल रही मंदी से निपटने के लिए वे कितने कृतसंकल्प हैं, क्योंकि यह धन लाकर देश का उत्थान किया जा सकता है। उनकी उदासीनता यह भी दर्शाती है कि आतंकवाद से लड़ने को वे कितने तत्पर हैं, क्योंकि स्विस बैंक में धन जमा करके रखने वालों का पता लगाकर आतंकवाद को कोष उपलब्ध कराने वाले लोगों का भी पता लगाया जा सकता है।

स्विस बैंक का मसला जब हम उठाते हैं, तो यह मसला सिर्फ वहां जमा धनराशि तक ही सीमित नहीं रह जाता, बल्कि इसके साथ भ्रष्टाचार, मंदी और आतंकवाद के मसले भी इसमें शामिल हैं़ सरकार स्विस बैंक के मसले पर किसी प्रकार का सकारात्मक रवैया नहीं दिखा रही है। इससे आतंकवाद और आíथक मंदी से लड़ने की उसकी घोषणाओं की भी पोल खुल जाती है।

स्विस बैंक में जमा धनराशि के मालिकों की जानकारी मिलने के बाद पता चल जाएगा कि देश में फैले भ्रष्टाचार में कौन किस हद तक धंसा हुआ है। वहां पड़ा धन राजनीतिज्ञों, अफसरशाहों और पूंजीपतियों का हैं। कुछ सालों से एक योजना के तहत यह बात उड़ाई जाती रही है कि देश में भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीतिज्ञों के कारण है। इस तरह की बातें करते समय यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि देश की राजनीति में लालबहादुर शास्त्री, चंद्रभानु गुप्ता, कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह, मधु लिमये, मधु दंडवते, सीताराम केसरी और भोला पाासवान शास्त्री जैसे ईमानदार लोग भी हुए हैं। स्विस बैंक में जमा धन के मालिकों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के बाद देश की जनता को यह बताने की और जरूरत नहीं पड़ेगी कि भ्रष्टाचार का असली स्रोत क्या है।

(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष हैं)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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