हमें बतौर पीएम रतन टाटा चाहिए

Ratan Tata
असाधारण दौर में असाधारण कदम उठाने होते हैं और असाधारण कदम एक असाधारण नेता ही उठा सकता है। अफसोस की बात यह है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने हमें हर बार निराश किया है। हम इस वक्त आर्थिक और आतंकवाद के मोर्चे पर संकट से जूझ रहे हैं। इससे आगे की आतंकी कार्रवाई निश्चित तौर पर भारत के लिए वैश्विक व्यापार के दरवाजे बंद कर देगी। इसका असर उन लाखों हिन्दुस्तानियों पर पडे़गा जो खुद को दो वक्त की रोटी कमाने की जद्दोजहद से बाहर निकालने की कोशिश में लगे हैं। हमें याद रखना होगा कि अब बदलाव इस बात पर निर्भर नहीं करते हैं कि कौन सी पार्टी सत्ता में आएगी।

अगर भारत इससे उबरता है तो हमें एक योजनाबद्ध बदलाव की जरूरत होगी और यह बदलाव तभी आएगा जब परिवर्तन की शुरुआत सबसे ऊपर से होगी। हमारे पास अब इतना वक्त नहीं रहा कि हम हिन्दुस्तान में किसी नई राजनीतिक शक्ति के उदित होने का इंतजार करें- इसमें शायद एक दशक से भी अधिक का वक्त लग जाएगा। हमें एनएसजी कमांडो जैसी किसी भरोसेमंद ताकत की जरूरत है, जिन्हें उस वक्त बुलाया गया था जब इस वास्तविकता का अहसास हो चुका था कि मुंबई पुलिस अपनी लाठियों और राइफलों से एके47 और हथगोलों से लैस उन मुट्ठी भर आतंकियों का मुकाबला नहीं कर सकती जिन्होंने बंधकों को अपना कवच बना रखा था। एनएसजी के कमांडो आए, हालात को अपने ढंग से संभाला और उसे फिर से सिविलिन अथारिटी को सौंप दिया। ठीक ऐसा ही हम अपनी राजनीति में चाहते हैं कि भारत की नई सरकार का नेतृत्व रतन टाटा करें और बदलाव के लिए हमें अगले दस सालों तक इंतजार न करना पड़े।

यहां मुख्य तौर पर तीन कोर इश्यू सामने आते हैं जो यह बताते हैं कि क्यों भारतीय लोकतंत्र मौजूदा संकट का सामना करने में ज्यादा सक्षम नहीं साबित हो रहा है। पहले नंबर पर हैं राजनेता- इनके बारे में क्या कह सकते हैं हम। हम जानते हैं कि वे अकर्मण्य और भ्रष्ट हो चुके हैं मगर गनीमत है कि उनकी हरकतें हमें सीधे हमें कोई जान-माल का नुकसान नहीं पहुंचातीं। दूसरे नंबर पर हम बात करेंगे हमारी ब्यूरोक्रेसी समेत उन इंस्टीट्यूशंस को खत्म करने की जिनमें अंग्रेजों के जमाने से कोई बदलाव नहीं आया है। इन्हीं इंस्टीट्यूशंस की बदौलत सत्ता में आने वाले भ्रष्ट राजनेताओं को जमने और सत्ता का बेजा फायदा उठाने का मौका मिल जाता है। दोनों ही तंत्र एक-दूसरे का पोषण करते हैं। इस गठनबंधन को तोड़ने की जरूरत है। तीसरी सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा में बड़े इन्वेंस्टमेंट की ताकि हममें से निरक्षर रह गए लोगों को बरगलाकर अयोग्य लोग कुर्सी पर काबिज न हो सकें। दरअसल ये तीन कोर इश्यू मिलकर एक चक्रव्यूह रचते हैं और अच्छी सरकार के रास्ते में बाधा खड़ी करते हैं।

रतन टाटा और उनकी टीम से हमें वही चाहिए जो एनएसजी कमांडो ने किया। समस्या की जड़ को पहचानना, उसे खत्म करना और उन नागरिकों के हाथों सौंपना जो उन नेताओं को पहचानते है जिन्हें वे चुनने जा रहे हैं। इस आदर्श सरकार को अगर हम पांच साल देते हैं तो वह इस लायक खुद को बना सकेगी कि राजनीति, इंस्टीट्यूशंस और इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐसे जरूरी बदलाव ला सके जिनकी बुनियाद पर हम एक बेहतर सरकार खड़ी कर सकें। यह वह बदलाव है जो भारत चाहता है।

अब हम बात करेंगे उन पांच अहम क्षेत्रों की जिस पर एक बेहतर सरकार को सोचना चाहिएः राष्ट्रीय सुरक्षा: हम दोबारा खुद को इस देश में सुरक्षित महसूस करें और हमारे दुश्मन कुछ गलत करने से पहले खौफ खाएं। इंफ्रास्ट्रक्चर: देश की पूंजी का सही इस्तेमाल करें, हमें सड़कें, तेज रफ्तार रेलगाड़ियां, पावर प्लांट्स की जरूरत है। शिक्षा: उस सरकार का गठन करने के लिए जो पुरानी लीक से हटकर हो। सरकारी प्रतिष्ठान:इसे स्वायत्त और जवाबदेह बनाएँ। शहरीकरणः भारत के छह लाख गावों पर गर्व करना छोड़ें और नए भारत के लिए छह हजार नए शहर तैयार करें। यह तब संभव होगा जब भाजपा और कांग्रेस अगले पांच सालों के लिए राजनीति को किनारे रखें और रतन टाटा और 300 काबिल लोगों की टीम को अगले चुनाव में पार्लियामेंट संभालने दें।

मैं जानता हूं कि पहली नजर में यह लगभग असंभव सा प्रतीत होता है मगर इस बात पर भी गौर करें कि बीते हफ्तों में भारत ने किस तरह की चुनौती का सामना किया है। भारत के सामने एक असाधारण चुनौती है। इस देश के सर्वोच्च पद को एक बार किसी ऐसे इंसान को संभालने दें जो उसके काबिल है। हमने अपने राजनेताओं को छह दशक दिए हैं अब सिर्फ आधा दशक एक ऐसे व्यक्ति को दें। कई दशक पहले एक इंसान के नेतृत्व में देश ने आजादी की नई सुबह को देखा था। हमारे पास रतन टाटा जैसा लीडर है जिसके पास उपलब्धियों से भरा एक जीवन है। हम सबको एक नए भारत के निर्माण में हाथ आगे बढ़ाना होगा।

राजेश जैन एक उद्यमी हैं जो सामाजिक मुद्दों पर अपने ब्लाग में निरंतर लिखते रहते हैं। यह आलेख हमने उनकी अनुमति से वनइंडिया में प्रकाशित किया है।

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