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अगर राजनीतिज्ञों को कवि का ह्रदय और चित्रकार का कौशल प्राप्त हो जाए..!

By Staff
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नई दिल्ली, 29 नवंबर (आईएएनएस)। राजनीति ने मेरी संवेदनाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया। राजनीति का पेशा पाखंड से भरा हुआ है। राजनीति में हमें वह सब व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता जो हम भीतर से महसूस करते हैं। राजनीति में आत्मसंतोष नहीं है, इसलिए मैंने तय किया कि मैं उन चीजों पर पकड़ कायम करने की कोशिश करूंगा, जिनमें राजनीति में आने से पहले निपुण था।

नई दिल्ली, 29 नवंबर (आईएएनएस)। राजनीति ने मेरी संवेदनाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया। राजनीति का पेशा पाखंड से भरा हुआ है। राजनीति में हमें वह सब व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता जो हम भीतर से महसूस करते हैं। राजनीति में आत्मसंतोष नहीं है, इसलिए मैंने तय किया कि मैं उन चीजों पर पकड़ कायम करने की कोशिश करूंगा, जिनमें राजनीति में आने से पहले निपुण था।

हालांकि मुझे मालूम था कि मैं इसे फिर से पूरी तरह नहीं पा सकता, फिर भी मैंने राजनीति से संन्यास ले लिया। मेरा मानना है कि समाज में राजनेताओं की जगह कलाकारों और वैज्ञानिकों को महत्व मिलना चाहिए। जब मैं प्रधानमंत्री बना तो मैंने मशहूर वैज्ञानिक राजा रमन्ना को रक्षा राज्यमंत्री नियुक्त किया। राजा रमन्ना 1974 के पोखरण परमाणु विस्फोट के सूत्रधारों में थे।

राजनीति जनता के लिए एक कविता की तरह है लेकिन राजनीतिज्ञों पर यह बात लागू नहीं होती है। राजनीतिज्ञ बाहरी प्रशंसा चाहता है, उसका उत्थान और पतन उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर नहीं है। कला के क्षेत्र में ऐसा नहीं है। यहां सिर्फ आप होते हैं और आपकी अभिव्यक्ति होती है। यदि कोई आत्मस्वीकृति का आनंद उठा सकता है तो राजनीति एवं कला की दुनिया के फर्क को समक्ष सकेगा।

राजनीति में मुझे किसी तरह का असंतोष नहीं है इसलिए कला को राजनीति के लिए मैं इस्तेमाल नहीं करता। राजनीति के लिए मेरे पास कई फोरम हैं-प्रेस, पब्लिक मीटिंग और जरूरत पड़ने पर लेख लिखकर अपने विचार व्यक्त कर सकता हूं। चित्रकारी (पेंटिंग) अपने आप में सामाजिक टिप्पणी हो सकती है। चित्रकारी में इशारा हो सकता है। उसकी मुझे सहायता लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम अपनी बात सीधे लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

किसी विचार या भाव को अवाम तक सहज रूप में पहुंचाने का चित्रकारी एक जरिया है। यदि राजनीतिज्ञों को कवि का ह्रदय और चित्रकार का कौशल प्राप्त हो जाए तो क्या कहना! राजनीति में संतोष जनता से सीधे जुड़ने में मिलता है, जबकि चित्रकारी में कोई व्यक्ति खुद को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है। इसके लिए किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

मेरी दिक्कत यह है कि एक समय मैं एक काम में ज्यादा मन लगता हूं, कई बार बहुत ज्यादा लग जाता है। किसी लेखक ने कहा है कि जहां तर्क खत्म होता है, वहीं से कला शुरू होती है। उस समय जो मन में आता है वही चित्रकारी की विषयवस्तु बन जाती है। उदाहरण के लिए सुनामी की विपदा, पर्यावरण का उजाड़, स्त्रियों की मनोदशा, खोया हुआ प्यार मेरी चित्रकारी के विषय हैं।

एक कलाकार से एक व्यक्ति ने पूछा कि आपकी कला समझ में नहीं आ रही है। कलाकार ने कहा कि तुम चिड़िया के गाने को समझते हो? क्या उसका गाना अच्छा लगता है? उसने कहा हां। कलाकार ने कहा, तो समझ लो कि वैसे ही चित्रकारी भी है।

कविता भी अचानक अभिव्यक्त होती है, भाव में आया लिख दिया। कविता का भाव अकेला आता है। यह हो सकता है कि एक के बाद दूसरी कविता का भी भाव आए। आम तौर पर जब शांतचित्त और विचार प्रवाह के साथ भाव आते हैं, तभी कविता लिखी जा सकती है और ऐसे ही समय में चित्रकारी भी हो सकती है।

कविता विचार प्रवाह से उत्पन्न होती है, परन्तु चित्रकारी तो प्रत्युत्पन्नमति से होती है। चित्रकारी में काम करते हुए, ब्रश, पेपर और केनवास देखकर ही मूड बनने लगता है। अगर मूड न भी हो तो इधर-उधर स्केच करके बन जाता है।

चित्रकारी की प्रक्रिया के दो हिस्से हैं। पहले का संबंध विचार (आइडिया) से है और दूसरा स्किल (शिल्प) से जुड़ा हुआ होता है। रचना की प्रक्रिया में विचार का महत्व ज्यादा है। उसके बाद जो बच जाता है वह है कि उसे कैसे प्रस्तुत किया जाए।

विचार में चित्रात्मकता (विजुअलाइजेशन) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कठिन काम है। उसके बाद रचना प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। वह आसान नहीं होती। चित्र और कविता में यही फर्क है कि चित्र आधा-अधूरा बनाकर छोड़ा जा सकता है। उसे समय मिलने पर पूरा किया जा सकता है।

कविता के बारे में यह नहीं कह सकते हैं कि एक लाइन आएगी तो दूसरी भी तुरंत आ जाए। आ भी सकती है और नहीं भी आ सकती है। उस पर अपना कोई नियंत्रण नहीं होता। कविता की हर पंक्ति के लिए निर्भर रहना पड़ता है और चित्रकारी में ऐसी बात नहीं है।

(पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से साक्षात्कार के आधार पर वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय द्वारा संयोजित एवं राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'मंजिल से ज्यादा सफर' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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