मध्यप्रदेश के चुनावी दौर में जलसंकट का सच

भोपाल, 24 नवंबर (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में इन दिनों चुनावी माहौल है और ऐसे में उम्मीद थी कि मानसून के बाद प्रदेश में पानी की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध रहेगी और कम से कम पीने के पानी की कमी नहीं होगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं। राज्य के ज्यादातर इलाकों में पानी की कमी है। गांव हों चाहे शहर हर जगह पानी के लिए हिंसक टकराव हो रहा है।

भोपाल, 24 नवंबर (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में इन दिनों चुनावी माहौल है और ऐसे में उम्मीद थी कि मानसून के बाद प्रदेश में पानी की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध रहेगी और कम से कम पीने के पानी की कमी नहीं होगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं। राज्य के ज्यादातर इलाकों में पानी की कमी है। गांव हों चाहे शहर हर जगह पानी के लिए हिंसक टकराव हो रहा है।

सरकार कहती है कि आज प्रति व्यक्ति 40 लीटर पानी उपलब्ध कराया जा रहा है और अब लक्ष्य 55 लीटर पानी की उपलब्धता का है। परंतु सच्चाई यह है कि राज्य के 5400 गांव पानी के निकटतम स्रोत से दो से छह किलोमीटर दूर हैं। इसके अलावा 90 बड़े और मझोले शहर ऐसे हैं जहां माह में 8-10 दिन ही जलापूर्ति होती है।

ऐसे में सरकार को सबसे पहले यह मानना होगा कि पानी और जंगल को खत्म और प्रदूषित होने से बचाया जाए। यह काम भ्रष्ट तंत्र के जरिये नहीं बल्कि समुदाय को संसाधनों का अधिकार देकर ही किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अनुसार वर्ष 2001 में राज्य की 9000 बसाहटों में प्रति व्यक्ति 40 लीटर से कम मात्रा में पानी उपलब्ध हो पा रहा था, वर्ष 2007-08 में न्यूनतम जरूरत से कम पानी की उपलब्धता वाली ऐसी बसाहटों की संख्या बढ़कर 15 हजार हो गई।

इसी तरह वर्ष 2001 में ही 448 बसाहटों में पानी के कोई स्रोत नहीं थे पर 2007-08 में सूखी बसाहटों की संख्या बढ़कर 2000 हो गयी है। ऐसा नहीं है कि पानी का सवाल मध्यप्रदेश के लिए अब कोई नया सवाल रह गया है। विगत 15 वषों में मध्यप्रदेश के कम से कम 14 जिले और ज्यादा से ज्यादा 39 जिले हर साल सूखे की चपेट में रहे हैं।

विडंबना यह है कि राज्य में इस संकट से निपटने की प्रक्रिया में टैंकरों या रेलगाड़ियों से पानी की आपूर्ति को समाधान माना गया। संकट के मूल कारणों पर बहस और उसके आधार पर कार्यवाही करने की कोई जद्दोजहद सरकार और जन प्रतिनिधियों ने नहीं की।

वर्ष 1980 के दशक के शुरुआती वषों में पानी के संकट के संकेत नजर आने लगे थे। तब सरकार ने कोई ठोस पहल नहीं की। इसके कारण साफ हैं। सरकार और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं संकट को इतना गंभीर बना देना चाहती थीं कि लोग पानी के निजीकरण और बाजारीकरण का तहेदिल से समर्थन करने लगें। ऐसा ही होने भी लगा है।

मध्यप्रदेश में एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक 3 हजार करोड़ रूपये के ऋण का निवेश कर रहे हैं। जिसके बाद प्रदेश में किसी गरीब व्यक्ति को भी पानी मुफ्त नहीं मिलेगा। यदि वह शुल्क नहीं देगा तो उसे पानी पीने का अधिकार भी नहीं होगा। इतना ही नहीं किसानों को भी इसके लिये भारी कीमतें चुकानी होंगी।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के चुनावों में सड़क, बिजली और पानी हमेशा की तरह फिर से मुद्दों के मैदान में है पर महत्वपूर्ण यह भी है कि विधानसभा चुनावों की ताजातरीन बेला में जल संकट के समाधान के स्थायी उपायों पर अब भी कोई बहस मुबाहिसा नहीं है।

ऐसे संकेत मिलते हैं कि पानी के संकट को अब चुनावी अखाड़ों का स्थायी मुद्दा हमारे मतदाता भी मानने लगे हैं और उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं होती है कि समस्याओं को हल करने का वायदा करके विधानसभा में बैठने वाले जनप्रतिनिधि वास्तव में समस्या की जड़ तक जाकर उसका स्थायी हल खोजने की कोशिश करेंगे।

बहरहाल भोपाल की 30 बावड़ियां उपेक्षा और राजनीति के कारण जरूर खत्म हो रही हैं। इस बात पर भी न तो जनप्रतिनिधियों ने बहस की न ही जनता की अदालत में यह सवाल उठा कि तालाबों के शहर भोपाल में ऐसा पानी का संकट पैदा क्यों हुआ कि 800 करोड़ रुपये के कर्जे के साथ 100 किलोमीटर दूर से नर्मदा की धारा को मोड़ कर लाने की जरूरत आ पड़ी है।

आज इस तालाब की सूखी ज़मीन पर 200 लोग खेती करने लगे हैं। इतना ही नहीं नर्मदा का पानी इंदौर लाने के बाद भी वहां एशियाई बैंक के कर्ज की जरूरत पड़ रही है। इस शहर में हर रोज 4 लाख पानी के पाउच बेचे जाते हैं जबकि डिण्डोरी जिले के सबसे भीतरी और दुर्गम पहुंच वाले आदिवासी बहुल बैगाचक में बोतलबंद पानी पहुंच चुका है परन्तु जल आपूर्ति की स्थाई व्यवस्था सरकार वहां नहीं कर पाई। केवल आदिवासी इलाकों में ही नहीं अब तो हर जिले में बिजली की कमी के कारण पानी की आपूर्ति अनियमित हो चुकी है।

कर्ज के 250 करोड़ रुपये की भोज वेटलैंण्ड परियोजना का अनुभव इस संभावना को ठोस रूप प्रदान करता है। ढाई सौ करोड़ रुपये खर्च करने के बाद आज भी बड़ी झील में 35 नालों और सीवेज लाइनों से मैला और गंदा पानी जाता है जिसे पीने का काम शहर के लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं। और तो और गांधी चिकित्सा महाविद्यालय और हमीदिया अस्पताल का गंदा पानी भी बहकर वहीं पर जाता है पर सरकार को पता नहीं है।

वर्ष 2007 से पानी का संकट कितना गंभीर रूप ले चुका है इसका अनुमान केन्द्रीय भूजल बोर्ड आंकड़ों से ही पता चलता है। मध्यप्रदेश के 6 विकासखण्ड ऐसे हैं जहां संग्रहीत होने वाले भूजल का 100 फीसदी से ज्यादा दोहन कर लिया गया जबकि 20 विकासखण्डों में 65 से 100 फीसदी यानी अधिकतम औसत से ज्यादा पानी का उपयोग किया गया।

केन्द्रीय भूजल बोर्ड की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार उनके द्वारा अध्ययन किये गये कुओं में से 40़ 73 प्रतिशत कुओं का जलस्तर दो मीटर उतर चुका है। कई जिलों में तो यह गिरावट चार मीटर से ज्यादा दर्ज की गई।

सरकार भी पानी के संकट को खुद आगे रहकर प्रचारित कर रही है ताकि निजीकरण की नीतियां लागू की जा सकें। रूफ टॉप हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहित करने की नीति के तहत भारत सरकार द्वारा मध्यप्रदेश के संदर्भ में किये गये विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया है कि पानी के संकट के समाधान का भी एक बहुत बड़ा-फायदेमंद बाजार है।

इसके मुताबिक ज्यादा जनसंख्या वाले 19 शहरी इलाकों में रहने वाले 9़ 76 लाख परिवारों पर ध्यान केन्द्रित किया जाना है। इनमें से अगर 25 फीसदी परिवारों ने भी यदि इस पद्धति को अपनाया तो 244 करोड़ रुपये खर्च होंगे। हर परिवार को 10 हजार रुपये इस पद्धति पर खर्च करने हैं जिसमें यह कोई सुनिश्चितता नहीं है कि जल संकट का स्थाई हल होगा। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भी इसे लागू करने का विचार है और इस पर 1911़5 करोड़ रूपये खर्च होंगे। यानि कि प्रदेश के लोगों को कुल 2156 करोड़ रुपये इस विचार पर खर्च करने होंगे।

पानी की गुणवत्ता और स्वच्छता पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करा पाने की क्षमता के मामले में भारत को 122वें स्थान पर रखा जाता है इसलिये स्वच्छ पानी बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये भारत 12 हजार करोड़ रुपये का बाजार है।

कुल मिलाकर जंगल के विनाश और पर्यावरण विरोधी विकास के कारण जल संरक्षण की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा है और जब तक उसे व्यवस्थित नहीं किया जायेगा तब तक पानी के संकट का स्थायी समाधान खोज पाना संभव नहीं है।

(सचिन कुमार जैन मध्यप्रदेश में स्वयंसेवी संस्था 'विकास संवाद' से जुड़े हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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