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विश्व वित्तीय संकट : मंदी से निपटने के लिए साझा नीति पर जोर (राउंडअप)

By Staff
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नई दिल्ली/वाशिंगटन, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। अमेरिका से शुरू हुए वित्तीय संकट ने यूरोप के बाद एशियाई बाजारों को भी लपेटे में ले लिया। ज्यादातर देशों में ब्याज दरें घटाई गईं और बाजार में पैसे डाले गए, लेकिन निवेशकों का भय नहीं गया। नतीजतन इस सप्ताह भारत समेत यूरोप और अमेरिका के सभी प्रमुख शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई।

इस बीच केंद्र सरकार ने घरेलू वित्तीय प्रणाली को निष्प्रभावी बनाए रखने के लिए तरलता की जरूरत के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने वित्तीय संकट से निपटने के लिए अमेरिका और यूरोप को साझा नीति बनाने पर बल दिया है।

भारत में इस संकट का व्यापक असर हुआ है। यहां के प्रमुख शेयर बाजारों में पूरे सप्ताह भारी गिरावट का दौर रहा। गुरुवार को दशहरे की छुट्टी की वजह से चार ही दिन कारोबार हुए, लेकिन इस अवधि में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने शेयर बाजारों से 88.3 करोड़ डॉलर निकाल लिए।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष सी. बी. भावे ने शुक्रवार को कहा कि शेयर बाजारों में कुछ भी असामान्य नहीं हो रहा है। हालांकि सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन शुक्रवार को देश के शेयर बाजारों में सात प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। इस सप्ताह एक भी कारोबारी दिन ऐसा नहीं रहा, जब सेंसेक्स में बढ़त दर्ज किया गया हो।

भावे ने एक निजी टेलीविजन चैनल से कहा, "हमारे पूंजी बाजारों में संस्थागत निवेशकों की ओर से मंदी के सौदे (शॉर्ट सेलिंग) नहीं किए गए।" उन्होंने कहा, "हम इस बात से भी आश्वस्त हैं कि दोनों प्रमुख स्टाक एक्सचेंजों ('नेशनल स्टाक एक्सचेंज' और 'बंबई स्टाक एक्सचेंज') में असामान्य कारोबार नहीं हो रहा है।"

सरकार भी मान चुकी है कि प्रमुख समस्या तरलता की उपलब्धता की है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को घटाकर 7.5 प्रतिशत किए जाने से यह तथ्य स्पष्ट हो गया है। लेकिन चिदंबरम का कहना कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद अब भी मजबूत बनी हुई है।

केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने शुक्रवार को दुनिया भर के पूंजी बाजार में आए तूफान की वजह से घरेलू वित्तीय प्रणाली को निष्प्रभावी बनाए रखने के लिए तरलता की जरूरत के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है।

वित्त सचिव अरुण रामनाथन ने नई दिल्ली में चिदंबरम का बयान पढ़ते हुए कहा, "व्यापार के लिए ऋण की उपलब्धता बेहद जरूरी होता है, इसलिए महत्वपूर्ण यह है कि अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में ऋण का सतत प्रवाह होता रहे।"

रामनाथन, चिदंबरम द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति के अध्यक्ष होंगे। उन्होंने कहा कि सरकार पूंजी बाजार पर पैनी निगाह रखे हुए है और बाजार में ऋण का प्रवाह बनाए रखने के लिए तमाम उपाय किए जाएंगे।

उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने वित्तीय संकट से निपटने के लिए अमेरिका और यूरोप को साझा नीति बनाने पर बल दिया है।

स्लोवाक राष्ट्रपति इवान गास्परोविक के साथ गुरुवार को मुलाकात के दौरान बुश ने कहा कि उनकी इच्छा यूरोपीय मित्रों के साथ सबसे बेहतर साझा नीति विकसित करने के लिए काम करने की है।

गौरतलब है कि बुश ने बुधवार को फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी, ब्रिटिश प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन, जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल और इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी से और अधिक आर्थिक नुकसान रोकने के प्रयासों में सहयोग करने के लिए कहा था।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के निदेशक डोमिनिक स्ट्रास कान ने गुरुवार को चेतावनी दी थी कि दुनिया मंदी के चंगुल में है और इससे बचाव के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग ही एकमात्र विकल्प है।

तरलता की कमी से निपटने के लिए नीदरलैंड ने भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अतिरिक्त 20 अरब यूरो उपलब्ध कराने की घोषणा की है। डच सेंट्रल बैंक के प्रमुख नॉट वेलिंक ने कहा कि यह धन बीमा कंपनियों सहित उन तमाम वित्तीय संस्थानों को उपलब्ध कराया जाएगा जिनको इसकी आवश्यकता होगी।

नीदरलैंड सरकार ने पिछले महीने ही बेल्जियम-डच बीमा कंपनी फोर्टिस के डच हिस्से का राष्ट्रीयकरण करने के लिए 16.8 अरब यूरो की रकम खर्च की थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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