बिहार की बाढ़ से हारना नहीं है : मनोज बाजपेयी
नई दिल्ली , 14 सितम्बर (आईएएनएस)। पिछले दिनों प्रकाश झ्झा से मुलाकात हुई। इस बातचीत में मैं यही समझ पाया कि हम टेलीविजन के जरिए या निजी संपर्को के जरिए लोगों को उत्साहित करें कि जिस संस्था को भी वे उचित समझें, उसके जरिए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान करें।
बहुत सारे टेलीविजन चैनलों से मेरी बात चल रही है, जो जमीनी स्तर पर वहां पर खड़े हैं और लोगों तक खबर पहुंचा रहे हैं। वैसे मेरा मानना है कि जरूरत इस बात की है कि लोगों को उत्साहित किया जाए कि वे अपने-अपने स्तर पर जो भी योगदान हो सके वह करें।
जिस राज्य की कुल आबादी के करीब 25 लाख लोग प्राकृतिक विपदा को झेल रहे हैं और न जाने कितने ही अपनी जान गंवा बैठे हैं, उसे सिर्फ एक इलाके से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। कोसी नदी या कोई भी पहाड़ी नदी, जो उत्तर के पहाड़ से निकलकर बिहार में प्रवेश करती है, उसका कहर और उसके किस्से मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। आश्चर्य इस बात का है कि हम सब देखते रह गए और पानी घुस आया। इसका मतलब यह है कि इतने साल में उन सारे बांधों पर कोई काम नहीं हुआ है।
आखिर कब तक गरीब इसी तरह से अपनी जान गंवाते रहेंगे? कब तक हम सिर्फ शहर को ही हिन्दुस्तान मानते रहेंगे? वैसे वहां इस दौरान सेना की टुकड़ी और वायुसेना भी पहुंची। कई राहत कैंप भी लगाए गए हैं। जब सुनामी आती है तब भी मेरा दिल रोता है उन सारे लोगों के लिए, जो इससे प्राभवित होते हैं।
आज कोसी ने कहर बरपाया है, तो भी बहुत परेशानी हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंसान की कीमत कुछ नहीं रह गई। सवाल यह है कि विकास की दर को किस तराजू पर मापा जाए। व्यक्तिगत तौर पर जो मैं कर रहा हूं, वह व्यक्तिगत है और उसके लिए ढोल पीटने की जरूरत नहीं समझता।
मेरा लोगों से भी निवेदन है कि बिना नगाड़े बजाते हुए अपनी अपनी तरफ से कुछ योगदान अवश्य करें। ब्लॉग पर अपने दर्शकों अपने पाठकों से अपनी संवेदना को बांटना, टेलीविजन और अखबारों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना या फिर निजी अनुदान देना या फिर व्यक्तिगत तौर पर लोगों को उत्साहित करना कि वे समस्या के साथ जुड़ें, यह भी पीड़ितों के बहुत काम आ सकता है।
हम सब अपने-अपने लोगों को उत्साहित करें, अपने-अपने लोगों को इन राहत कार्यो से जुड़ने के लिए प्रेरित करें, यही आज के समय की आवश्यकता है। निवेदन उन लोगों से है जो ऊपर के ओहदों पर बैठे हुए हैं। आपसे हाथ जोड़कर विनती हैं कि अब इस समस्या का निदान खोजिए। न सिर्फ बांधों की मरम्मत की जाए, नेपाल से संधि को मजबूत किया जाए, ऐसी विपदा के वक्त वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए और प्राकृतिक विपदा आने के संकेत देने वाली जितनी भी मशीनें हैं उन्हें कार्यान्वित किया जाए ताकि हिन्दुस्तान का व्यक्ति इस देश में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। वह यह सोचकर आश्वस्त हो सके उसकी रक्षा करने वाले लोग जिम्मेदार हैं और उसका भला चाहते हैं।
(साभार : मनोज बाजपेयी के ब्लॉग से। ब्लॉग का पता है : मनोजबाजपेयी डॉट इट्जमाईब्लॉग डॉट कॉम)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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