डाकुओं ने संभाली बटेश्वर की विरासत

लगभग 13 वर्षो से बटेश्वर की पहचान मंदिरों की नगरी के रूप में रही है। यहां कभी दो सौ मंदिर हुआ करते थे। लेकिन वक्त के थपेड़ों ने इन मंदिरों को जमीनदोज कर दिया। मंदिरों की यह नगरी पूरी तरह पत्थरों में तब्दील हो चुकी है।
बीहड़ पट्टी के इस इलाके में विरासत संवारना तो दूर आम आदमी के सामान्य जीवन की कल्पना करना तक बेमानी है। क्योंकि यहां दशकों से डकैतों की सल्तनत रही है।
बटेश्वर के पुरातत्विक महत्व के कारण लगभग दो वर्ष पहले इन्हें पुराने रूप में लौटाने की एक योजना बनाई गई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए इस योजना पर अमल करना आसान नहीं था।
इस क्षेत्र में डकैतों के प्रभाव के कारण कोई काम करने को तैयार नहीं था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीक्षण पुरातत्वविद के. क़े मोहम्मद भी इस बात से सहमत हैं। उन्होंने यहां का पहला दौरा किया तो उन्हें भी इस बात का एहसास हो गया कि इस इलाके में डकैत सक्रिय हैं।
मोहम्मद बताते हैं कि चंबल के सबसे खतरनाक डकैत निर्भय सिंह गुर्जर और उसके साथियों को देखकर वे सकते में आ गए थे। उन्होंने निर्भय को अपनी योजना से अवगत कराया तो उसे भी लगा कि बिखरे पड़े पत्थर मंदिर का रूप ले सकते हैं। उसने मदद का भरोसा दिलाया।
मोहम्मद के मुताबिक निर्भय ने वह स्थान छोड़ दिया। परिणामत: वह बटेश्वर में चालीस मंदिरों को नया रूप देने में सफल रहे हैं। फिलहाल उनके सामने कई चुनौतियां हैं। बाकी बचे 160 मंदिरों को उनका मूर्त रूप दिया जाना बाकी है।
बटेश्वर के मंदिर भले ही ढह गए मगर उनके पत्थरों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा। मोहम्मद का कहना है कि माफिया समूहों ने इन बेशकीमती पत्थरों को ठिकाने लगा दिया होता। डकैतों के कारण माफिया यहां तक नहीं पहुंच पाए इसीलिए बिखरे पड़े पत्थरों को मिलाकर मंदिर का रूप दिया जाना आसान हो रहा है।
दो साल पहले तक भूकंप जैसी तबाही से पीड़ित बटेश्वर की तस्वीर अब बदलने लगी है। जगह-जगह मंदिर नया रूप ले चुके हैं और बिखरे पड़े पत्थरों को जोड़कर उन्हें नया आकार दिया जा रहा है।
निर्भय के बारे में मोहम्मद का कहना है कि वह भले ही डकैत था मगर उसे पुरातन परंपरा और विरासत से लगाव रहा होगा तभी उसने बटेश्वर को मंदिरों की नगरी में बदलने में सहयोग किया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस


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