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कौन तय करेगा चयनकर्ताओं की जवाबदेही

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sourav gangulyभारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) टीम के चयन में हस्तक्षेप नहीं करता है. चयनकर्ता खिलाड़ियों के नाम की सूची देकर अपने काम की (इतिश्री) सम लेते हैं, लेकिन कोई यह बताने को तैयार नहीं होता कि टीम में खिलाड़ियों का चयन किस आधार पर किया जाता है.

भारतीय क्रिकेट में यह सवाल हमेशा अबू पहेली रहा है कि चलती सीरीज के दौरान आगामी सीरीज के लिए टीम की घोषणा क्यों की जाती है. अब तो चयनकर्ताओं ने इस पहेली में एक और पेंच जोड़ दिया है. वे मीडिया को टीम की घोषणा एक सूची जारी कर देते हैं जबकि पहले ऐसा नहीं होता था.

टीम की घोषणा बाकायदा संवाददाता सम्मेलन में की जाती थी और तमाम सवालों के जवाब दिए जाते थे कि खिलाड़ियों का चयन होने या नहीं होने के पीछे क्या आधार रहा. मगर अब लगता है कि बोर्ड और चयनकर्ता दोनों ने यह पारदशिता खत्म कर दी है.

आस्ट्रेलिया में अगले महीने होने वाली त्रिकोणीय एकदिवसीय ऋंखला के लिए भारतीय टीम की घोषणा एडिलेड में गुरुवार से शुरु होने वाले चौथे और आखिरी टेस्ट से पहले की गयी है. भारत पर्थ में तीसरा टेस्ट जीतकर स्कोर 1-2 कर चुका है और उसे एडिलेड में सीरीज में बराबरी हासिल करने के लक्ष्य के साथ उतरना है. लेकिन इतने महत्वपूर्ण मैच से पहले टीम की घोषणा ने कई सवालों को फिर से उठा दिया है.

पूर्व कप्तानों सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ को वनडे टीम में जगह नहीं मिली है. आस्ट्रेलिया के लिए सिरदर्द बन चुके वी वी एस लक्ष्मण पर विचार करना भी चयनकर्ता जरुरी नहीं समझते. ये तीनों बल्लेबाज फिलहाल टेस्ट टीम की सबसे मजबूत कड़ी हैं, लेकिन एडिलेड टेस्ट से ठीक पहले चयनकर्ताओं ने इन तीनों दिग्गजों को अंगूठा दिखाकर क्या इनके मनोबल पर असर नहीं डाला है.

द्रविड तो पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू एकदिवसीय श्रृंखला में टीम से बाहर रहे थे जबकि गांगुली को जब एक दिवसीय टीम से बाहर कर दिया गया है. गांगुली को वनडे टीम से बाहर करने पर जहां चयनकत्र्ताओं की कड़ी आलोचना हो रही है वहीं बंगाल क्रिकेट संघ का आरोप है कि एक दिवसीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के कहने पर गांगुली को वनडे टीम से हटाया गया है.

गांगुली को हटाने के पीछे चाहे जो भी नाम लिए जा रहा है, लेकिन चयनकर्ताओं का अपना विवेक क्या कहता है. हमेशा प्रदर्शन को चयन का मापदंड बताने की दुहाई देने वाले चयनकर्ता टीम चुनते समय इस मापदंड को कैसे भूल जाते हैं. यदि द्रविड ने गत वर्ष अपनी कप्तानी नहीं छोड़ी होती तो पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू एक दिवसीय श्रृंखला से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था चाहे उनका फार्म खराब क्यों नहीं रहता.

गांगुली अपनी कप्तानी के समय में भी खराब खेलते थे तब उन पर कोई ऊंगली नहीं उठाता था, लेकिन पिछले एक वर्ष से जब वह अपने कैरियर की सबसे बेहतरीन फार्म में खेल रहे हैं तो उन्हें वनडे टीम से हटा दिया गया है. गत एक वर्ष में गांगुली और धोनी के प्रदर्शन की ही तुलना कर ली जाए तो यह बात साफ हो जाएगी कि गांगुली को हटाना कितना गलत फैसला है.

गांगुली ने इस दौरान 30 मैचों में 44.29 के औसत से 1240 रन बनाए हैं जिनमें 12 अर्धशतक शामिल हैं जबकि धोनी ने 33 मैचों में 44.12 के औसत से 1103 रन बनाए हैं जिनमें एक शतक और सात अर्धशतक शामिल हैं. इस अवधि में भारतीयों में गागुली से आगे युवराज सिंह (33मैच-1287 रन) और सचिन तेंदुलकर (32मैच) है.

टीम इंडिया में जो युवा खिलाड़ी चुने गए हैं उनमें रोबिन उथप्पा ने गत वर्ष 20 मैचों में 29.9 औसत से 509 रन, रोहित शर्मा ने तीन मैचों में 20.33 के औसत से 61 रन, दिनेश कार्तिक ने 16 मैचों में 26.09 के औसत से 28 रन और सुरेश रैना ने एक मैच में 23 रन बनाए थे.

यदि 2007-08 के रणजी सत्र को देखा जाये तो उथप्पा ने पांच मैचों में 188 रन और रोहित ने पांच मैचों में 191 रन बनाये हैं. जबकि आठ मौचों में 807 रन बनाने वाले चेतेश्वर पुजारा, सात मैचों में 659 रन बनाने वाले सुब्रमण्यम बद्रीनाथ, आठ मैचों में 697 रन बनाने वाले मोहम्मद कैफ और सात मैचों में 615 रन बनाने वाले विकेटकीपर पार्थिव पटेल को नजरअंदाज किया गया.

द्रविड ने तो इस रणजी सत्र में दो मैचों में ही 375 रन बना दिये थे और मौजूदा टेस्ट सीरिज में वह अपने फार्म में भी लौट आये है, लेकिन चयनकर्ताओं ने गांगुली के साथ-साथ उनके अनुभव को भी नजरअंदाज किया जबकि त्रिकोणीय ऋंखला में भारत का सामना विश्व कप विजेता आस्ट्रेलिया और उप विजेता श्रीलंका से होने जा रहा है.

अब ऐसा लग रहा है कि जिस तरह बंगाल क्रिकेट संघ गांगुली का मामला उठा रहा है उसी तरह उत्तरप्रदेश क्रिकेट संघ को कैफ का, सौराष्ट्र क्रिकेट संघ को पुजारा का और तमिलनाडु क्रिकेट संघ को बद्रीनाथ का मामला उठाना चाहिये कि इन खिलाड़ियों को लगातार रन बनाने के बावजूद नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है और फार्म में उनसे कहीं पिछड़े बल्लेबाजों को टीम में जगह दी गयी है.

बोर्ड टीम चयन में बेशक हस्तक्षेप नहीं करता है लेकिन कम से कम यह तो सुनिश्चित कर सकता है कि चयनकर्ता टीम चयन में जबाबदेह हो और मात्र सूची जारी कर अपनी औपचारिकता पूरी न करें.

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