Pujari Anitha Bai: पैरों से अपनी तकदीर और कामयाबी की तहरीर लिखने वाली किशोरी, जानिए संकल्प से सिद्धि की कहानी

Pujari Anitha Bai का नाम पैरों से अपनी तकदीर और कामयाबी की सुनहरी तहरीर लिखने वाली किशोरी के रूप में जाना जाएगा। इन्होंने अपने संकल्प से दिखाया है कि हौसले से हर बाधा हारती है। जानिए संकल्प से सिद्धि की कहानी

Pujari Anitha Bai

आंध्र प्रदेश के कुरनूल में रहने वाली 17 वर्षीय पुजारी अनीता बाई का जन्म बिना हाथों के हुआ। हालांकि, इन्होंने अपने हौसले की उड़ान से ये साबित कर दिखाया है कि दिव्यांग होना कोई अभिशाप नहीं है। हौसले के दम पर ऊंची उड़ान भरने वाली अनीता को भले ही परीक्षा देने के लिए पैरों से कलम पकड़ेने पड़े, उन्होंने हार नहीं मानी। इंटरमीडिएट सेकेंड ईयर की परीक्षा लिखने वाली अनीता बाई की एक तस्वीर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ वायरल हुई थी। राहुल भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अनीता से मिले थे।

स्क्राइब का विकल्प मिला, लेकिन खुद लिखा अपना भाग्य

17 वर्षीय पुजारी अनीता बाई की प्रेरक कहानी के बारे में दी न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया कि हाल ही में अपने पैरों से 12वीं की परीक्षा लिखने वाली किशोरी अनीता के पास नियमों के तहत स्क्राइब यानी परीक्षा का विकल्प था। हालांकि, अनीता ने परीक्षा खुद लिखने का फैसला लिया और स्क्राइब का इस्तेमाल नहीं किया।

आदिवासी सुगली समुदाय की होनहार

अपने दम पर परीक्षा लिखने और कामयाबी की नई इबारत लिखने का फैसला करने वाली अनीता ने दृढ़ निश्चय और अटूट आत्मविश्वास से शारीरिक अक्षमता को बेमानी साबित कर दिखाया है। कुरनूल में आदिवासी सुगली समुदाय के एक परिवार में जन्मीं अनीता के संकल्प को देखकर लोग कहते हैं कि इस किशोरी ने अपने भाग्य को बदल दिया है।

अक्षमता को अपनी ताकत में बदला

जब किशोरी के हाथ नहीं थे तो परिवार की धारणा थी कि उसकी शिक्षा से समझौता करना पड़ सकता है। लोगों का मानना था कि उसे अपने लिए जीवन बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी। हालांकि, सभी बाधाओं और आशंकाओं को बेमानी साबित करते हुए 17 साल की अनीता ने अपनी शारीरिक अक्षमता को अपनी ताकत में बदल दिखाया।

'कभी हार न मानने' की भावना

खास बात ये कि जिस हाथ का न होना लोगों को कमजोरी लगती थी, उसे अपनी 'कभी हार न मानने' की भावना से अनीता ने बौना साबित कर दिखाया और अक्षमता पर विजय पाई। 17 साल की अनीता ने अपने पैरों की मदद से लिखना सीखने के लिए लंबे समय तक अभ्यास किया, खुद को प्रशिक्षित किया।

सरकारी अधिकारी बनने का सपना

अपने छह अन्य भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के नाते, अनीता न केवल उनके लिए बल्कि कई ऐसे लोगों के लिए प्रेरणा बनी हैं, जो अपनी विकलांगता से जूझ रहे हैं। अपनी पढ़ाई के बारे में 17 वर्षीय अनीता ने कहा वे अपनी फील्ड में हमेशा टॉप पर रहना चाहती हैं। अपने प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं। अपनी बौद्धिक क्षमता और शानदार शैक्षणिक प्रदर्शन से खास पहचान बनाने वाली अनीता बड़ी होकर सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखती हैं।

पढ़ाई में होशियार बच्ची ने पैरों को हथियार बनाया

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नारनिकी प्राथमिक सरकारी स्कूल और माध्यमिक शिक्षा अलुरु में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) से पूरी की। 10वीं की परीक्षा में अनीता ने 9.0 जीपीए हासिल किए। उन्होंने अपने हाथों से लिखने वाले छात्रों की तरह ही पैरों से लिखने के बावजूद स्पष्ट लिखना सीखा।

लोगों से मदद की अपील

अपने कौशल को अभ्यास से निखारने वाली अनीता बाई की कहानी याद दिलाती है कि जब कोई व्यक्ति बाधाओं का सामना करता है तो मायने यह रखता है कि वह कितनी तेजी से इससे उबरता है। अपनी ताकत को पहचानने और लगातार आगे बढ़ते रहने का संकल्प लेने वाली अनीता ने सोशल वर्क करने और चैरिटी करने वाले लोगों से आर्थिक सहयोग की अपील की है। उन्होंने लोगों से मदद मांगी है ताकि वह अपने सपनों को साकार कर सकें और निकट भविष्य में सरकारी अधिकारी बन सकें।

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