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मायावती पीएम उम्मीदवार नहीं: येचुरी

By शेष नारायण सिंह
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    Sitaram Yechury
    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आला नेता और पोलित ब्यूरो के सदस्य, सीताराम येचुरी देश की राजनीति में एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं। छात्र राजनीति से अपना राजनीतिक जीवन शुरू करने वाले श्री येचुरी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। अर्थशास्त्र के विद्वान सीताराम येचुरी ने 1989 के बाद की भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है। मनमोहन सिंह सरकार को उनकी पार्टी का समर्थन प्राप्त था।

    सीताराम येचुरी का दावा है कि पूंजीवादी अर्थशास्त्र के पक्षधर डा. मनमोहन सिंह चाहते हुए भी बहुत सारी नीतियां नहीं लागू कर सके जो आम आदमी के हित का ध्यान नहीं रख रही थीं। सांप्रदायिकता के सवाल पर भी येचुरी की राय दो टूक है। उनका कहना है कि अगर तीसरे मार्चे की सरकार बनी तो बजरंग दल जैसे सांप्रदायिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया जायेगा। वरिष्ट पत्रकार और दैट्स हिन्दी के जनसंवाददाता शेष नारायण सिंह के साथ एक खास मुलाकात में सीताराम ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय समस्याओं पर खुलकर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इंटरव्यू के कुछ अंश :

    आप साढ़े चार साल तक मनमोहन सरकार का समर्थन करते रहे। चुनाव के छ: महीने पहले हट गए और अब सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं। क्या आप भी सरकार की सफलता और असफलता के लिए बराबर के जिम्मेदार नहीं हैं?

    सरकार को समर्थन कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के आधार पर दिया गया था। और शुरू से ही हमने दबाव बनाकर रखा था कि उस साझा कार्यक्रम के तहत काम करना था। पहला तो आर्थिक विकास को आम आदमी के लाभ को ध्यान में रखकर चलाया जाना था। लेकिन मनमोहन सरकार तो धन्ना सेठों और पूंजीवादी देशों को फायदा पहुंचाने पर आमादा थी। लेकिन हमने उनकी मनमानी नहीं चलने दी और जहाँ तक हो सका आम आदमी को बर्बाद होने से बचाया।

    देश में आर्थिक मंदी है और रोजगार के अवसर रोज कम हो रहे हैं। क्या इस सब के लिए आपकी पार्टी जिम्मेदार नहीं है?

    कांग्रेस सरकार और डा. मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्री तो रुपए को कैपिटल एकाउंट के तहत कन्वर्टिबिल बनाना चाहते थे। और अगर ऐसा हो गया होता तो आज मंदी का असर बहुत भयानक होता। हमारी पार्टी और लेफ्ट फ्रंट ने उस कोशिश का जोरदार विरोध किया जिसके कारण मंदी का असर बहुत कम हो गया। इसलिए हमारे होने से आर्थिक मंदी का शिकार होने से देश बच गया। और अब यह सरकार हमारे हटने के बाद पूंजीपतियों को बचाने के लिए सरकारी खजाने से पैसा दे रही है।

    सांप्रदायिकता के सवाल पर आपकी क्या पोजिशन है? केंद्र सरकार के अब तक के काम से आप संतुष्ट हैं क्या?

    संतुष्ट तो बिलकुल नहीं। हमने मांग की थी कि सांप्रदायिक दंगों के मामलों को हल करने के लिए नया कानून बने। सरकार टालती रही और कुछ नहीं किया। हमारी मांग थी कि गुजरात दंगों की जांच सी-बी-आई- से कराई जाय। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तरह की बात की थी लेकिन कुछ नहीं किया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम बनी और नतीजा सामने है कि नरेंद्र मोदी सरकार की एक मंत्री सलाखों के पीछे है।

    सांप्रदायिक संगठनों की ताकत रोज ही बढ़ रही है। इसके बारे में आपकी क्या सोच है?

    हमारे तो घोषणा पत्र में लिखा है कि सांप्रदायिक हिंसा को रोका जायेगा, सभी दंगों पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित किया जायेगा, अल्पसंख्यकों पर हमला करने वालों की खिलाफ मजबूती से कार्रवाई की जाएगी। शिक्षा और संस्कृति में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बढ़ावा दिया जायेगा। अगर हमारी सरकार आई या हमारे सहयोग से सरकार बनी तो हम बजरंग दल पर पाबंदी लगा देंगे।

    मायावती भी आपके साथ हैं और प्रधानमंत्री पद की दावेदार भी हैं आपकी तरफ से? बीजेपी की कृपा से तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। मोदी का चुनाव प्रचार कर चुकी हैं। क्या बजरंग दल के खिलाफ कार्रवाई होने देंगी?

    पहली बात तो मायावती हमारी तरफ से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार नहीं हैं। हमने ऐसा कोई वायदा नहीं किया है। हमने साफ कह दिया है कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के बारे में विचार किया जायेगा। बहुजन समाज पार्टी के साथ हमारा कोई चुनाव पूर्व समझौता भी नहीं है। जहाँ तक उनकी बीजेपी से दोस्ती की बात है, उन्होंने हमें वचन दिया है कि अब बीजेपी उनका कोई मतलब नहीं है।


    और आम उनके इस वचन पर विश्वास करते हैं? क्योंकि आपके मोर्चे में ज्यादातर लोग - चंद्रबाबू नायडू, एचडी देवेगौड़ा, नवीन पटनायक, मायावती सभी कभी न कभी संघ या बीजेपी की कृपा से सत्ता का सुख भोग चुके हैं?

    बीजेपी की सहयोगी पार्टियों को अपने साथ लेकर हमने बीजेपी के सरकार बनाने के सपने को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया है। बीजेपी का साथ इन सभी पार्टियों और नेताओं को बहुत महंगा पड़ रहा है। इनके अपने जनाधार से भी दबाव पड़ रहा है। खासकर चंद्र बाबू नायडू अल्पसंख्यकों के वोट से जीतकर आये थे और बीजेपी के साथ चले गए। नतीजन उनको भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। नवीन पटनायक ने तो हमसे साफ कहा है कि बीजेपी के साथ जाकर गलती हुई।

    और अब आखरी सवाल। अगर सरकार में शामिल होने की नौबत आई तो क्या सरकार में शामिल होंगे या 1996 और 2004 की तरह ऐतिहासिक भूल फिर दोहराएंगे?

    1996 सरकार में शामिल होने न होने के सवाल पर 1998 में हुई कलकत्ता कांग्रेस में विस्तार से चर्चा हुई थी और तय यह किया गया था कि अगर कभी सरकार में शामिल होने का मौका लगा तो पार्टी की केंद्रीय कमेटी उस विषय पर विचार करेंगी और उचित फैसला लेगी। इसलिए अभी से कुछ कह पाना संभव नहीं है।

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