एक दिन पिता के नाम...

20 जून यानि 'फादर्स डे' पाश्चात्य संस्कृति ने चाहे हमें और कुछ सिखाया हो या नहीं, पर दिनों को मनाना तो सिखा ही दिया है. कोई भी दिन हो हमे बस मनाने की इंतजार रहता है. इस दिन भी नेट या समाचार पत्र भरे रहते है. लोग अपने-अपने अनुभव बताने को बेताब रहते हैं, लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं बताऊंगी. क्योकि आज के बदलते समय में हमे बदलना बहुत जरुरी है. नही तो रिश्तों में खटास आते समय नही लगेगा.

पिता यानि पापा घर के मुखिया होते हैं. उस नाते उनके कुछ फर्ज बन जाते हैं, जिसका उन्हे सुखद भविष्य के लिए पालन करना जरुरी हो जाता है. ऐसे मे भगवान शिव का उदाहरण देना उचित होगा. जिस तरह से शिव जी ने विष का पान किया था. ना तो उसे निगला था और ना ही उसे बाहर निकाला था. बस गले में ही रखा था, वैसे ही घर के मुखिया को करना चाहिए. घर की परेशानी को ना तो बाहर किसी को बताए और ना ही उसे दिल से लगा कर बैठे.

कलह हर घर में होती है, लेकिन अगर वो उसे बाहर के लोगो को बताएगा तो बात बढ़ जाएगी और अगर गले से नीचे उतार लेगा तो खुद तबियत खराब करके बैठ जाएगा. शिव जी के माथे पर जैसे चादँ शंति का प्रतीक है, बस वैसे ही अपना दिमाग शांत रखना चाहिए. उनके मस्तक से निकली गंगा भी इसी बात की प्रतीक है कि गुस्से के पल को भी शांत होकर बिताएं. घर परिवार मे छोटे-मोटे फैसले लेते हुए मन को शांत रखें अगर खुद ही बात-बात पर चिल्लाकर बोलेगें तो घर मे कलह ज्यादा बढ़ जाएगी.

मुखिया का काम यह भी है कि परिवार के सब लोगों को मिला कर रखें. मुखिया को सदा इसी सोच में रहना चाहिए कि किस तरह परिवार और ज्यादा खुशहाल रह सकता है. हमेशा आगे की सोचनी चाहिए. सभी को खुश रखने की सोच मे रहना चाहिए. खैर बातें तो बहुत सारी हैं, लेकिन अगर ढेर सारी बातें सोचकर न अमल करने से अच्‍छा है एक-दो बातों को ध्‍यान में रखें और उस पर हमेशा अमल करें. हमारी ओर से आपको फादर्स डे की ढेर सारी शुभकामनाएं.

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