हिन्दी साहित्य में बूढ़ों की तानाशाही

अब यह भी जान-समझ लें कि साहित्य को लेकर कौन लोग बेचैन और चिंतित हैं? इस वक्त साहित्य की चिंता में सबसे ज्यादा बूढ़े साहित्यकार मरे जा रहे हैं। वो तो उनका बस नहीं चलता, नहीं तो वे साहित्य के लिए अपना 'चिंतित दिल' तक निकालकर हमारे सामने रख दें। दिल वो इसलिए निकालकर नहीं रखा सकते क्योंकि उनके शरीर की तरह उनका दिल भी कमजोर और बूढ़ा हो चला है। अब कौन बेवकूफ उनके कमजोर और बूढ़े दिल को यहां देखना चाहेगा? यह भी हम खूब जानते हैं कि उनका दिल कभी भी बैठ सकता है।
थके हुए बूढ़ों का प्रलाप
हिंदी साहित्य के प्रति पाठकों की बेदिली का एक कारण और भी है कि हमारा हिंदी साहित्य बूढ़ा हो चला है। हिंदी में आधे से ज्यादा साहित्य थके हुए बूढ़ों द्वारा ही लिखा जा रहा है। बूढ़े हिंदी साहित्य में कुंडली मारकर बैठे हैं। उस कुंडली से न वे खुद बाहर निकलना चाहते हैं, न किसी दूसरे को वहां प्रवेश करने देते हैं। बूढ़े हिंदी साहित्य के तानाशाह हैं।
विडंबना देखिए, हर छोटा-बड़ा इन बूढ़े तानाशाहों के आगे हर वक्त नतमस्तक रहता है। साहित्य की हर पत्रिका पर इनका कब्जा है। वहां इनका कोई न कोई चेला-चपाटा अपने गुरु के 'तलवे चाटने' को हर वक्त तैयार बैठा रहता है। कब गुरु की रचना आए और कब चेला उस 'कूड़े' को अपनी पत्रिका में छापकर गद-गद महसूस करे। इस मामले में जनसत्ता सबसे आगे रहता है। वहां बूढ़ों का अच्छा कब्जा है।
मास्टर जी की हिन्दी क्लास
वैसे आप माने या न माने हिंदी साहित्य की सबसे ज्यादा मट्टी-पलीद प्राध्यापकीय बूढ़ों ने ही की है। इन प्राध्यापकों ने साहित्य को भी अपनी कक्षा समझकर ही चलाया है। खूसट मास्टरों की तरह ये लोग हाथ में डंडा थामे हर किसी को लठियाने में ही लगे रहते हैं। विद्यालय की नौकरी और साहित्य में गंडागर्दी ही इनका एकमात्र कार्य होता है। मजे की बात यह है कि हर अख़बार और पत्रिका का संपादक इनका चेला है। भला चेला कैसे अपने गुरु की रचना को अस्वीकृत कर सकता है! गुरु का 'कूड़ा' भी उसे 'प्रसाद' ही लगता है। इन प्राध्यापक किस्म के साहित्यिक बूढ़ों ने साहित्य के क्षेत्र में घोर अराजकता और गुटबाजी फैला रखी है।
साहित्यिक बूढ़े तीन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं। आलोचना, कविता और समीक्षा। साहित्य का हर बूढ़ा आलोचक खुद को रामचंद्र शुक्ल और नामवर सिंह से कम नहीं समझता। सच कहूं तो हिंदी आलोचना इन थके आलोचकों की कलम के नीचे पड़ी करहा रही है। अपनी कलम से ये कब, किसकी गर्दन उड़ा दें कोई नहीं जानता। आलोचना पर मोटी-मोटी बौद्धिक किताबें लिखकर पता नहीं ये बूढ़भस हमें समझाना क्या चाहते हैं? आलोचना पर अब तक जितनी भी किताबें मैंने इनकी देखी-पढ़ी हैं लगभग सभी में एक-सा ही रोना-धोना है कि आलोचना पिछड़ रही है। जब तक तुम जैसे लोग आलोचना के भीतर टांग-घुसाई करते रहेंगे, आलोचना पिछड़ेगी नहीं तो क्या सुधरेगी? पहले तुम तो आलोचना के भीतर टांग-घुसाई बंद करो।
डंप होता कविताओं का कूड़ा
कविता की तो पूछिए ही मत। हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा कूड़ा अगर कहीं से आ रहा है तो वह कविता का ही क्षेत्र है। जवानों से ज्यादा बूढ़े कविताएं लिख रहे हैं। अब अशोक वाजपेई जो और जैसी कविताएं लिखते हैं, उसे कम से कम आमजन तो समझ ही नहीं सकता। हमारे बीच ऐसे और भी अपठनीए कवि हैं क्या नाम लूं! दरअसल, कविता लिखना-कहना सबसे सरल काम है। दो-चार शब्दों को यहां-वहां से जोड़ा-तोड़ा और कविता तैयार। न हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा। इस वक्त हिंदी साहित्य में हर रोज टनों के हिसाब से कविताओं का कूड़ा डंप हो रहा है।
कविता से कहीं ज्यादा सरल है समीक्षा-लेखन। किसी अपने को प्रसन्न करने का सबसे सरल और बेहतरीन माध्यम है समीक्षा-लेखन। संबंधों की समीक्षाएं लिखते रहो और लेखकों, प्रकाशकों और संपादकों को खुश करते रहो। बूढ़े इस काम में भी माहिर हैं। तो बंधु, अगर साहित्य को बचाना है तो साहित्यिक बूढ़ों की जड़ों को तुरंत ही काट डालो। हमारे बीच रहकर ये सबसे ज्यादा नुकसान युवा-पीढ़ी का कर रहे हैं। इनके सिंहासनों को हिलाना ही बेहतर होगा नहीं तो....
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