जानिए... राहु से बनने वाले कुछ शुभ-अशुभ योगों के बारे में
लखनऊ। वैदिक ज्योतिष में राहु को आकस्मिक फल देने वाला ग्रह माना गया है। राहु जातक को अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल देता है और यह सब अचानक होता है। या तो जातक के जीवन में अचानक कोई अच्छी घटना होती है जिसके बारे में उसे खुद अंदाजा नहीं होता है या फिर ऐसी अशुभ घटना हो जाती है जिसके बारे में वह कभी सोच भी नहीं सकता। इसीलिए राहु ग्रह के द्वारा बनने वाले विभिन्न् योगों को भी बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। यह कुंडली के विभिन्न् स्थानों में विभिन्न् ग्रहों के साथ बैठकर कुछ विशेष योग बनाता है, जो अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के हो सकते हैं। आइए आज जानते हैं ऐसे ही कुछ खास योगों के बारे में।

राहु को आकस्मिक फल देने वाला ग्रह कहा जाता है
- कपट योग : जब कुंडली के चौथे स्थान में शनि हो और राहु बारहवें स्थान में हो तो कपट योग बनता है। जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह बेहद कपटी किस्म का होता है। उसकी कथनी और करनी में अंतर होता है।
- अष्ट लक्ष्मी योग : जब राहु छठे भाव में और गुरु दशम स्थान में हो तो अष्ट लक्ष्मी योग बनता है। यह शुभ योग है और इसके कारण व्यक्ति शांति के साथ यशस्वी जीवन जीता है।
- अरिष्ट भंग योग : मेष, वृषभ, कर्क इन तीन राशियों में से कोई लग्न हो और राहु 9, 10, 11वें स्थान में हो तो अरिष्ट भंग योग होता है यह शुभ फलदायक होता है।
- चांडाल योग : बृहस्पति के साथ कुंडली के किसी भी स्थान में राहु के होने से चांडाल योग का निर्माण होता है। इसे गुरु चांडाल योग भी कहते हैं। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति धर्म विरोधी बातें करता है और पाखंड में आकंठ डूबा रहता है।

सूर्य राहु की युति हो
- क्रोध योग : लग्न स्थान यानी कुंडली के पहले भाव में सूर्य, बुध या शुक्र के साथ राहु बैठा हो तो क्रोध योग का निर्माण होता है। इस योग के प्रभाव से जातक को लड़ाई झगड़ा, वाद विवाद के परिणामस्वरूप हानि और दु:ख उठाना पड़ता है।
- ग्रहण योग : जब कुंडली में सूर्य राहु की युति हो तो ग्रहण योग बनता है। अगर यह युति लग्न में बन जाए तो व्यक्ति अत्यंत क्रोधी किस्म का होता है।
- परिभाषा योग : लग्न में या 3, 6, 11वें स्थान में से किसी भी स्थान में राहु हो तो परिभाषा योग बनता है। यदि ऐसे राहु पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह अत्यंत शुभ फलदायक होता है। यह व्यक्ति को सुखी और निरोगी जीवन प्रदान करता है।
- सर्प शाप योग : मेष या वृश्चिक राशि का राहु पंचम स्थान मेे हो, पंचम या लग्न में मंगल गुरु हो या पंचम में मंगल राहु हो तो सर्प शाप योग होता है। इस योग में जातक की संतानों को कष्ट भोगना पड़ता है।
- लग्न कारक योग : मेष, वृषभ या कर्क लग्न हो और 2, 9, 10 इन स्थानों को छोड़ कर अन्य किसी स्थान में राहु हो तो लग्न कारक होता है यह योग सर्वारिष्ट निवारक होता हैं।













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