Navratri 2020: नवरात्रि में अपने संकल्प के अनुसार शुभ मुहुर्त में करें घट स्थापना

नई दिल्ली। इस नवरात्रि अपनी कामना के अनुसार करें देवी के मंत्रों का जापघट स्थापना के लिए पूर्व दिशा में ईशान कोण, पश्चिम दिशा में वायव्य कोण तथा उत्तर दिशा का मध्या विशेष माना गया है। नवरात्र की प्रतिपदा पर शुभ मुहूर्त में धातु या मिट्टी के लाल रंग का कलश स्थापित करना चाहिए। सर्वप्रथम पूजन स्थल को पवित्र करें, इसके बाद कलश में शुद्ध जल भरें। यदि संभव हो तो तीर्थो के जल से कलश को परिपूर्ण करना श्रेष्ठ माना गया है।

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    Navratri 2020: इस शुभ मुहुर्त में करें घट स्थापना

    जल पूरण करने के बाद कलश में पंच रत्न व हल्दी तथा लाल व पीले पुष्प डालें। कलश के जल में हल्दी मिश्रित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से कार्य में सिद्धि, रोग दोष का निवारण तथा बाहरी बाधा का प्रभाव समाप्त होता है। जल भरने के बाद कलश पर डंठल वाले पान के पत्ते तथा नारियल रखें। कलश के कंठ पर मौली बांधने के बाद पंचोपचार पूजन कर नैवेद्य लगाएं। आरती के बाद संकल्प को दोहराकर देवी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करें।

    संकल्प के अनुसार करें कलश की स्थापना

    • आर्थिक उन्नति के लिए स्वर्ण कलश स्थापित करने की भी मान्यता है।
    • घर परिवार में सुख शांति के लिए चांदी के कलश की स्थापना करने की मान्यता है।
    • तंत्र की सफलता के लिए तांबे के कलश की स्थापना करना चाहिए।
    • नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए पंचधातु का कलश स्थापित करें।
    • शत्रु नाश व सर्वत्र विजय के लिए अष्ट धातु का कलश स्थापित करना चाहिए।
    • पारिवारिक सुख-सौभाग्य के लिए तीर्थो की मिट्टी से बने कलश की स्थापना करना चाहिए।

    घट स्थापना का मुहूर्त

    • शुभ- सुबह 7.52 से 9.19 बजे
    • चर- दोपहर 12.12 से 1.38 बजे तक
    • लाभ- दोपहर 1.38 से 3.05 बजे तक
    • अमृत- दोपहर 3.05 से शाम 4.32 बजे तक
    • अभिजित मुहूर्त प्रात: 11.49 से 12.35 तक

    (ये मुहूर्त उज्जैन के सूर्योदय के अनुसार हैं। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार इनमें कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक का अंतर हो सकता है।)

    जवारे का महत्व

    कलश स्थापना के साथ गेहूं के जवारे लगाने की परंपरा भी है। पूजन स्थल पर मिट्टी के कलश पर रखे सिकोरे में तीर्थ की मिट्टी भरकर उसमें जवारे की स्थापना करें। नौ दिन तक यथा संकल्प अनुसार जवारे का पूजन करें। नवरात्र की पूर्णाहुति पर जवारे का पूजन कर विसर्जित किया जाता है। इनमें से कुछ जवारे को तिजोरी, अन्न के भंडार तथा बच्चों के पढ़ाई वाले स्थान पर रखने से महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महाकाली व अन्नपूर्णा का वास रहता है।

    मलमास पूर्ण

    नवरात्रि प्रारंभ होने के साथ ही 17 अक्टूबर से अधिकमास मलमास समाप्त हो जाएगा। इसके बाद विवाह को छोड़कर अन्य शुभ कार्य प्रारंभ हो जाएंगे। विवाह देव उठनी एकादशी के बाद ही प्रारंभ होंगे। इस दिन से सूर्य भी अपनी राशि बदलकर तुला राशि में प्रवेश कर जाएगा।

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