जानिये कैसे बनता है गजकेसरी योग?
कुण्डली में अनेक प्रकार के योगों का निर्माण होता है, उन योगों के भिन्न-भिन्न प्रकार के फल प्राप्त होते है। सर्वाधिक प्रचलित योग है गजकेसरी योग। गजकेसरी योग का गज और केसरी इन दो शब्दों से निर्माण हुआ है। गज का अर्थ है हाथी और केसरी मतलब सिंह।
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जिस प्रकार से गज और सिंह में अपार साहस, शक्ति होती है उसी प्रकार से जन्मकुण्डली में गजकेसरी योग होने से व्यक्ति साहस व सूझबूझ के दम पर, उच्च पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सामाज में सम्मानीय होता है। आइये जानते कैसे बनता है कुण्डली में गजकेसरी योग?
- गुरू लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10 स्थानों) में होना चाहिए।
- गुरू चन्द्र से केन्द्र (1, 4, 7, 10 स्थानों) में होना चाहिए।
- कुण्डली के एक, चार, सात व दसवें स्थान में गुरू व चन्द्र की युति होने से भी गजकेसरी योग का निर्माण होता है।
- गुरू व चन्द्र शुभ स्थानों में बैठै हो और एक-दूसरे को अपनी सप्तम दृष्टि से देख रहें हो। ऐसी स्थिति में भी गजकेसरी योग बनता है।
कब खंडित होता है गजकेसरी योग
- गुरू के वक्री होने पर, नीच राशि में होने से या फिर बृहस्पति ग्रह अस्त हो।
- गुरू शत्रु राशि में हो या पाप ग्रहों के द्वारा दृष्ट हो।
- गुरू अच्छा है किन्तु चन्द्रमा नीच का है, पीड़ित है, अशुभ भावों में या पापी ग्रहों से दृष्ट है तो बन रहा गजकेसरी योग खंडित हो जाता है।
नोट- वैसे तो अधिकांश कुण्डलियों में गजकेसरी योग का निर्माण होता है किन्तु वह शुभ फल नहीं देता है। क्योंकि कहीं न कहीं गुरू पीड़ित रहता होगा। इस योग में गुरू की शुभता अति आवश्यक होती है। यदि गुरू पापी, नीच का, शत्रु राशि या शत्रु ग्रहों से दृष्ट नहीं है तो अवश्य ही गजकेसरी योग शुभ फल आपको प्राप्त होगा। गुरू जितना बलवान है गजकेसरी योग उतना ही उत्तम फल देगा। अगले लेख में गजकेसरी योग के फलों के बारें में बताया जायेगा।












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