रेत में कैसे हरियाली लाता है इसराइल?
पीने और खेतों की सिंचाई के लिए पानी का सवाल तो भारत के सामने भी है.
हथियार और रडार टेक्नॉलॉजी के अलावा इसराइल दुनिया में अपनी सिंचाई प्रौद्यौगिकी के लिए भी जाना जाता है.
उसने दुनिया को दिखाया है कि कैसे रेगिस्तान को हरा-भरा किया जा सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा के दौरान कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच समझौता होने की उम्मीद है.
पानी की हर बूंद का इस्तेमाल करना इसराइल से सीखा जा सकता है.
वे समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाते हैं. बेकार पानी को रिसाइकिल कर उसका फिर से इस्तेमाल करते हैं.
इसराइल में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का तकरीबन आधा हिस्सा रिसाइकल्ड होता है.
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1. उन्होंने ऐसे पेड़ लगाए जो हवा से नाइट्रोजन सोख सकते थे और उसे ज़मीन तक पहुंचा सकते थे. इससे बिना किसी खर्च के ज़मीन की उत्पादकता बनी रही और ये व्यवस्था लंबे समय के लिए टिकाऊ है.
2. इसराइल की ड्रिप इरिगेशन टेक्नॉलॉजी. इसके पीछे विचार ये था कि फसलों को पानी की कुछ बूंदे अगर लंबे समय तक दी जाएं तो ये कारगर हो सकता है. ये पानी या तो जमीन की सतह पर पहुंचा दिया जाए या फिर उसके जड़ के आस-पास.
पौधे के निचले हिस्से तक पानी पहुंचाने के लिए पाइप्स और ट्यूब्स का सहारा लिया जाता है. ड्रिप इरिगेशन का मकसद है पानी की कम से कम बर्बादी और ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल.
इसराइली इंजीनियर शिम्सा ब्लैस ने पहली बार बड़े और लंबे पाइप्स में प्लास्टिक के निकासी प्वॉयंट्स बनाकर ये सिंचाई तकनीक विकसित की थी.
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3. विकासशील देशों में पेड़ काटने की रवायत के विपरीत इसराइल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए धूप का जहां तक हो सके, इस्तेमाल करता है.
4. वे ऐसी फसलों पर फ़ोकस कर रहे हैं जिन्हें खारे पानी या ख़राब क्वॉलिटी के पानी से सींचा जा सके. वे जैतून से लेकर अर्गन के पेड़ों तक में इसका प्रयोग कर रहे हैं.
5. वे ऐसे पेड़ पौधों पर ध्यान दे रहे हैं जो रेगिस्तानी इलाकों में उगाये जा सकें. वे रेगिस्तानी इलाकों में पैसे और प्रोटीन के लिए एक्वाकल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं जिसके लिए खारे पानी की जरूरत होती है.
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