चुनावी एजेंडे से ग़ायब हैं किसान

इस दौरान एक चीज़ जो बार-बार खली वो ये कि किसानों की धरती वाले पंजाब में किसानों की दशा कहीं बड़ा मुद्दा बनता नज़र नहीं आया.
नेताओं के भाषण में किसानों का ज़िक्र तो ज़रुर हुआ. चाहे वे लुधियाना में एनडीए की महारैली हो या प्रधानमंत्री की पंजाब में की गई चुनावी सभाएँ. लेकिन ऐसा कम ही लगा कि किसान चुनावी एजेंडे का हिस्सा हैं.
सो नेताओं की रैलियों से निकलकर हम खेत खलिहानों में किसानों के बीच पंजाब के रोपड़ ज़िले में जा पहुँचे.
बाबू सिंह पिछले करीब 40 सालों से खेती के काम में लगे हैं. वे बताते हैं कि नई तकनीक के आने से बदलाव तो कई आए लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि अब कई किसान खेती नहीं करना चाहते क्योंकि ये घाटे का सौदा साबित हो रहा है.
वे कहते हैं, "बीज, खाद, कीटनाशक सब महँगे हो गए हैं, कर्ज़े की ब्याज़ दर अधिक है और पैदावार की बिक्री में किसान को कम और एजेंट को ज़्यादा पैसा मिलता है."
किसानों की दुर्दशा
उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए परमिंदर सिंह कहते हैं कि कम ज़मीन वाले किसानों के पास तो अपने ट्रैक्टर के लिए लिया गया कर्ज़ चुकाने तक के पैसे नहीं है.
किसानों की हालत पिछले कुछ सालों में अच्छी नहीं रही है
पंजाब शुरू से ही कृषि प्रधान प्रदेश रहा है और यहाँ से प्रदेश में ही नहीं देश-विदेश में अन्न निर्यात होता है. लेकिन किसानों की हालत पिछले कुछ सालों में अच्छी नहीं रही है.
कई किसान अब तक आत्महत्या कर चुके हैं.
गाँव के लोग बताते हैं कि चुनावी मौसम के दौरान तो नेताओं और कार्यकर्ताओं का ज़ोर लगा ही रहता है लेकिन उनकी मूल समस्याएँ सालों से ज्यों की त्यो हैं- चाहे वो अकाली दल की सरकार रही हो या फिर कांग्रेस की.
कर्ज़ में डूबे किसानों की समस्या, फ़सल की सही क़ीमत नहीं मिलने की समस्या, बारिश-कीड़े से बर्बाद होती फसल....इन सब दिक्कतों से किसानों को हमेशा दो चार होना पड़ता है.
किसानों के अपने संगठन कई गुटों में बंटे हुए हैं. पंजाब में इस बार चुनाव मोटे तौर पर बादल परिवार और अमरिंदर सिंह की आपसी रंजिश के घेरे में बंध कर रह गए.
अगली सरकार किसकी बनेगी, इस पर किसानों की राय बंटी हुई थी लेकिन इस बात को लेकर सब एकजुट नज़र आए कि उसकी नीतियों में जय किसान वाला पुराना नारा फिर गूँजे और ये नारा कागज़ों से निकलकर ज़मीनी हक़ीकत में तब्दील हो.


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