Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

इंदिरा गांधी की देन है जेएनयू में भारत-विरोधी नारे!

अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे जेएनयू के वामपंथी संगठनों द्वारा यह कहा जाना कि जम्मू-काश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है, कोई नई बात नहीं है। वो हमेशा से ही ऐसा कहते रहे हैं। इस बात का गवाह जेएनयू का इतिहास है। और इस इतिहास से जब पर्दा उठेगा तो तत्कालीन राजनीति के कई चेहरे बेनकाब होंगे और फिर जेएनयू में तत्कालीन सत्ता-पोषित वामपंथियों का मूल मकसद भी बेनकाब होगा। और कुछ देर बाद आपको भी लगने लगेगा कि कैम्पस में भारत-विरोधी नारे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की देन है।

JNU

जेएनयू का अनसुना इतिहास

दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे उसे वाम अखाड़ा बनाने की सुनियोजित साजिश जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा रची गई थी। देश की राजधानी से अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकुल किताबों के कंटेंट तय करने, अपने अनुकूल इतिहास गढ़ने के लिए जेएनयू की स्थापना की गयी थी।

सत्ता पोषित सुविधा भोग और विलासी जीवन पद्धति जेएनयू को विरासत में मिली। बौद्धिक मोर्चे पर कांग्रेस के अनुकूल माहौल बनाये रखने के लिए तत्कालीन इंदिरा सरकार ने जेएनयू नामक इस प्रकल्प को स्थापित किया। अब सवाल है कि आखिर दिल्ली जैसी जगह जहाँ एक वामपंथी विधायक तक की राजनीतिक हैसियत नहीं बन पाई है, वहां जेएनयू का यह किला ‘लाल-सलाम' के नारों से दशकों तक कैसे अभेद बना रहा है।

महफूज़ महसूस नहीं कर रही थीं इंदिरा गांधी

इस सवाल का जवाब साठ के दशक के उतरार्ध एवं सत्तर के दशक की शुरुआत में जाने पर मिल जाता है। दरअसल यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी खुद के लिए ही कांग्रेस में महफूज़ नहीं महसूस कर रहीं थीं। कांग्रेस में विरोधी खेमा सिंडिकेट-इन्डिकेट के रूप में कमर कसने लगा था। गैर-कांग्रेसवाद का असर देश में यों चला कि साठ के दशक में ही देश के दस राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार बन चुकी थी।

इंदिरा की स्वीकार्यता और नेहरू की विरासत की आभा भी कमजोर पड़ने लगी थी। चूंकि इंदिरा गांधी को यह आभास हो चुका होगा कि अब राजनीति और सत्ता में बने रहना केवल नेहरू की पारिवारिक विरासत के नाम पर सम्भव नहीं है। लिहाजा वे विकल्पों पर काम शुरू कर चुकी थीं। साठ के दशक के अंतिम दौर में कांग्रेस में इंदिरा के लिए ऐसी स्थिति तक आ गयी कि उन्हें सरकार चलाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी और इसके एवज में कम्युनिस्टों ने भी अकदामिक संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

दूसरी ओर जनसंघ का विस्तार

दूसरी तरफ जनसंघ आदि का विस्तार भी देश में होने लगा था। वोट अब बैंक की शक्ल में आसानी से कांग्रेस के झोले में जाता नहीं दिख रहा था। परिणामत: इंदिरा गांधी ने सेकुलरिज्म बनाम साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर भरोसा दिखाया। हालांकि हिंदुत्व की राजनीति के जवाब में साम्प्रदायिकता का विमर्श तो इंदिरा देश में चलाना चाहती थीं लेकिन यह काम वो सीधे कांग्रेस की बजाय कुछ अन्य चेहरों के भरोसे करना चाहती थीं।

चूंकि इंदिरा को इस बात का डर जरुर रहा होगा कि यदि हिंदुत्व को साम्प्रदायिकता के तौर पर प्रचारित करने का काम खुद कांग्रेस करने लगेगी तो कहीं हिन्दू ध्रुवीकरण कांग्रेस के खिलाफ न हो जाय। अत: प्रत्यक्ष जोखिम इंदिरा लेना नहीं चाहती थीं।

इंदिरा ने अपने लोगों को सौंप दी जेएनयू

हिंदुत्व के बहाने साम्प्रदायिकता पर विमर्श तो चलाना ही था और इसका काम जेएनयू में अपने लोगों को बिठाकर इंदिरा ने कम्युनिस्टों के माध्यम से उन्हें सौंप दिया। अपने अनुकूल विमर्श को मुख्यधारा के एजेंडे में लाने का इंदिरा गांधी का यह तरीका बिलकुल अंग्रेजों जैसा था।

खैर, मलाई खाने की आस में कम्युनिस्ट दलों ने इंदिरा के साथ मिलकर अहम पदों के बदले कांग्रेसी एजेंडे को संस्थाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने का काम उन्होंने बखूबी सम्हाल लिया। जेएनयू के प्रोफेसर उसी समय से आजतक वामपंथ की खोल ओढ़कर देश में हिंदुत्व को साम्प्रदायिकता बताने की किताबें, लेख, रीसर्च गढ़ने लगे।

जेएनयू में एडमीशन यानि वामपंथी!

जेएनयू में दाखिले और नियुक्ति का मानदंड तो वामपंथी होना लगभग परोक्ष रूप से तय हो चुका था। वैचारिक छुआछूत इतना ठूस-ठूस भरा गया कि इतने दशकों बाद भी वैचारिक विविधताओं का समान प्रतिनिधित्व आजतक जेएनयू में कायम नहीं हो सका है!

जनादेश का मिजाज बदल रहा है। कांग्रेस अपने पापों की सजा भुगतने को अभिशप्त है। अत: जेएनयू में भी बदलाव स्वाभाविक था। जेएनयू में अब दूसरी विचारधाराएँ भी स्थापित होने लगीं। विचारधारा थोपने का रोना रोने वाले वामपंथी यह क्यों नहीं बताते कि आखिर इन पांच दशकों में जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर किसी एक विचारधारा का कब्जा क्यों रहा है?

जिस दिल्ली में वे एक पार्षद नहीं बना पाते वहां वे जेएनयू कैम्पस में किस जनाधार के आधार पर कब्जा किये बैठे हैं? और क्या कारण हैं, कि ये लोग आये दिन भारत-विरोधी नारे लगाने लगते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं, कि अब एक और विचारधारा का संक्रमण यहां होने लगा है?

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+