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मां नर्मदा की परिक्रमा, जिंदगी बदल देती है

धरती पर केवल एक ही नदी 'मां नर्मदा' हैं, जिनकी परिक्रमा की जाती है। इनकी परिक्रमा का महत्व कई यज्ञों के समान माना जाता है। हजारों-लाखों लोग मां नर्मदा की पंचकोशी और पूर्ण परिक्रमा पूरी करते हैं।
Chaitanya Das Soni
क्या आम, क्या खास सभी पांव-पांव परिक्रमा पथ पर नजर आते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, उमा भारती सहित केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल से लेकर तमाम राजनेता भी यह परिक्रमा कर चुके हैं।
नर्मदाजी की प्रदक्षिणा यात्रा में एक ओर जहां रहस्य, रोमांच और खतरे हैं वहीं अनुभवों का भंडार भी है। इस यात्रा के बाद आपकी जिंदगी बदल जाएगी। परिक्रमा करने से पापों का नाश होकर व्यक्ति को मोक्ष मिलता है या वह मरने के बाद सद्गति को प्राप्त होता है।
हर माह नर्मदा पंचक्रोशी यात्रा होती है और दूसरी और पूरी नर्मदा की परिक्रमा होती है। प्रत्येक माह होने वाली पंचक्रोशी यात्रा की तिथि कैलेंडर में दी हुई होती है। यह यात्रा तीर्थ नगरी अमरकंटक, ओंकारेश्वर और उज्जैन से प्रारंभ होती है। जहां से प्रारंभ होती है वहीं पर समाप्त होती है।
नर्मदा नदी मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। मैकल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई प्रायः 1312 किलोमीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है।
नर्मदा को मध्‍य प्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है। नर्मदा की उत्‍पत्ति मैकल पर्वत के अमरकंटक शिखर से हुई है। बता दें कि ये पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और खम्‍बात खाड़ी में गिरती है। नर्मदा भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लंबी नदी है।
नर्मदा परिक्रमा मार्ग के मामले में पैदल परिक्रमा के लिए लगभग 120 दिन लगते है। इसके अलावा वाहन से लगभग 15 दिन लगते। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश और गुजरात की जीवन रेखा है, लेकिन इसका अधिकतर भाग मध्यप्रदेश में ही बहता है। क्योंकि मध्यप्रदेश के तीर्थ स्थल अमरकंटक से इसका उद्गम होता है और नेमावर नगर में इसका नाभि स्थल है।
ग्रंथों में नर्मदा नदी की उत्‍पत्ति और उसकी महत्‍ता का विस्‍तार से वर्णन मिलता है। इन्‍हीं कथाओं के अनुसार नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से होने वाले फल की भी जानकारी मिलती है। नर्मदा ही इकलौती नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। पुराणों में उल्‍लेख मिलता है कि गंगा स्‍नान से भी जो फल नहीं मिलता वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्‍त हो जाता है।
ओंकारेश्वर से यात्रा शुरू होगी, जो बड़वानी, अंकलेश्वर, मीठीतलई, भरूच, नरेश्वर, गुरुदेश्वर, सरदार सरोवर, अलीराजपुर, महेश्वर, मांडू, इंदौर, नेमावर, बरमन घाट, भेड़ाघाट, माई का बगीचा, महाराजपुर और होशंगाबाद पर जाकर समाप्त होगी, यात्री यहां से सीधे ओंकारेश्वर पहुंचते हैं।
जिस दिन गंगाजी का अवतरण हुआ वह बैशाख मास की सप्तमी तिथि थी। इसी कारण से सनातन से अब तक बैशाख माह की सप्तमी को गंगा सप्तमी के रूप मनाया जाता है। एक और मान्यता है कि गंगासप्तमी को गंगा जी नर्मदा मैया से मिलने आती हैं।
ग्रंथों में नर्मदा नदी की उत्‍पत्ति और उसकी महत्‍ता का विस्‍तार से वर्णन मिलता है। इन्‍हीं कथाओं के अनुसार नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से होने वाले फल की भी जानकारी मिलती है। नर्मदा ही इकलौती नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। पुराणों में उल्‍लेख मिलता है कि गंगा स्‍नान से भी जो फल नहीं मिलता वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्‍त हो जाता है।