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खतरे में गंगा, ब्रह्मपुत्र नदियां

IPCC की ताज़ा रिपोर्ट में खास तौर से गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के भविष्‍य पर चिंता व्यक्त की गई है...
पर्यावरण पर काम करने वाली संयुक्त राष्‍ट्र की संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (IPCC) के वर्किंग ग्रुप 2 ने सोमवार को रिपोर्ट जारी की जिसमें गंगा नदी का खास तौर से जिक्र हुआ।
रिपोर्ट के एशिया चैप्टर में आईपीसीसी वैज्ञानिकों ने भारत की लाइफलाइन गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों पर कुछ खास फोकस किया है। प्रस्तुत हैं रिपोर्ट के मुख्‍य अंश...
IPCC वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि 21वीं सदी के मध्‍य तक गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में पानी की कमी हो सकती है, जिसकी वजह से उनके किनारे बसे शहरों पर बड़ा आर्थ‍िक और सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है।
जलवायु में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन अगर इसी प्रकार जारी रहे, तो अगले 50 वर्षों में इन नदियों के अलग-अलग भागों में पानी की कमी हो जाएगी।
पानी की कमी की आशंका
दरअसल इसका सबसे बड़ा कारण वो हीट-वेव, यानि गर्म हवाएं होंगी जो भारत समेत पूरे एशिया को अपनी चपेट में लेंगी। साथ ही वायु प्रदूषण आग में घी डालने का काम करेगा।
तीव्र मौसमी घटनाएं
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सदी के अंत तक ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भारत व अन्य एशियाई देश 5 से 20 प्रतिशत तक सूखे की चपेट में आ सकते हैं।
आने वाले समय में भारत में गर्मी के मौसम में तापमान पहले की तुलना में साल दर साल बढ़ेगा, जिसकी वजह से बिजली की डिमांड बढ़ेगी, क्योंकि जनसंख्‍या भी तेज़ी से बढ़ रही है।
भीषण गर्मी
मॉनसून में कम वर्षा के कारण किसानों की भू-जल पर निर्भरता बढ़ेगी, और ऐसी परिस्थितियों में भी बिजली की खपत बढ़ेगी। गंगा नदी के दोनों ओर बसे शहरों में पानी की भीषण कमी हो सकती है।
"पहले आपको हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की गति को सझना होगा, क्योंकि नदियों का बेस-फ्लो हिन्‍दुकुश क्षेत्र में ही तय होता है। अगर पृथ्‍वी का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा, तो जमीनी क्षेत्रों में गर्मी बढ़ेगी।"
डॉ. अरोमार रेवी, IPCC ऑथर
डॉ. अरोमार रेवी ने आगे कहा कि बढ़े हुए तापमान का जितना असर जमीनी इलाकों में होगा, पहाड़ों पर उससे कई गुना होगा। ऊपर से बेमौसम बारिश की आशंका बढ़ जाएगी। ऐसे में जब नदी में पानी चाहिए होगा, तब कमी होगी, जब नहीं चाहिए होगा, तब नदियां उफान पर होंगी।
"हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की घटनाओं में तेज़ी आयेगी, जिससे ग्लेशियर के टूटने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में गंगा नदी, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, आदि नदियों पर खतरा बढ़ जाएगा। यहां तक कैलाश मानसरोवर भी खतरे से अछूता नहीं रहेगा।"
डॉ. अंजल प्रकाश, IPCC ऑथर
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