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Buckwheat  छत्तीसगढ़ में होती है टाउ की खेती, इन गुणों से है भरपुर

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में तिब्बती शरणार्थियों द्वारा टाउ के खेती की शुरुआत की गई. लेकिन आज लगभग 2500 किसानों के आय का मुख्य जरिया बना हुआ है. कई पोषक तत्वों वाले टाउ की मांग अब भारतीय बाजार में बढ़ रही है।
Manendra
टाउ को अंग्रेजी में Buckwheat कहा जाता है, इसे उत्तर भारत में कुट्टू के नाम से जाना जाता हैं। आपके इस कुट्टू का लैटिन नाम फैगोपाइरम एस्कलूलेंट है। यह पॉलीगोनेसिएइ परिवार का पौधा है। Buckwheat पौधे से प्राप्त फल छोटे चने के आकार के होते हैं।
छत्तीसगढ़ में टाउ की खेती तिब्बती शरणार्थियों ने 50 साल पहले शुरू की थी। नेपाल से तिब्बती अपने साथ टाउ के बीज साथ लेकर आये थे। जो आज मैनपाट और जशपुर के 2500 किसानों की आय का जरिया बन गया है।
टाउ का उपयोग गेंहू के आटे की तरह  किया जाता है। लेकिन टाउ की गिनती फल में होती है। भारत में व्रत , त्योहार में फलाहार के रूप में पराठे का सेवन किया जाता है. इसलिए कुट्टू के आटे की मांग बढ़ जाती है।
टाउ ( BuckWheat) से ढंके सैकड़ो एकड़ खेत छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के अम्बिकापुर के मैनपाट में देखे जा सकते हैं। इसमें बहुत सुंदर गुच्छों में फल और फूल आते हैं।
भारत के ठंडे प्रदेशों में जैसे हिमालय के पर्वतीय हिस्सों, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, दक्षिण के नीलगिरी में और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में उगाया जाता है। जापान में बड़ी मात्रा में इसकी खेती की जाती है।
कुट्टु का आटा पूड़ी, ढोकला, पराठा जैसे व्यंजन बनाने के आलवा आज कुकीज, बिस्किट, मोंमोस बनाने के लिए कुट्टु के आटे का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब बाजार में कई ब्रांड के ऐसे प्रॉडक्ट उपलब्ध हैं.
डॉक्टरों के अनुसार इसमें सीलिएक रोग (पाचन सबंधी बीमारी) से पीड़ित व्यक्ति के लिए उत्तम आहार माना जाता है। यह एक ग्लूटेन फ्री आहार होता है। इसके आटे में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, फॉलेट, जिंक, विटामिन-ई, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, और फास्फोरस पाया जाता है।
इसमें उपस्थित न्यूट्रीयंस के कारण पेट में पित्त सबंधी बीमारी, कब्ज, अस्थमा, हड्डियां और हृदय रोग सबंधी बीमारी के लिए लाभदायक माना जाता है। कोलेस्ट्रॉल को कम करता है, त्वचा सबंधी बीमारियों में इसका सेवन लाभदायक होता है।