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Bhoramdev Temple : खजुराहो में क्यों बनी हैं मिथुन मुर्तियां ?

कबीरधाम जिले में स्थित 11वीं सदी का प्राचीन शिव मंदिर अपनी बनावट और कलाकृति के लिए मशहूर है। आइए आपको छत्तीसगढ़ के खजुराहो की विशेषता बताते हैं।
Manendra
कवर्धा से करीब 18 किमी दूर चौरागांव में मैकल पर्वत समूह से घिरा भोरमदेव मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है। इस मंदिर की बनावट खजुराहो और कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान है।

भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11 वीं शताब्दी में फणी नागवंशी राजा गोपाल देव ने कराया था. जहां भगवान शिवलिंग स्वरूप में विराजमान हैं।

इस प्राचीन शिव मंदिर में शिवरात्रि के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा यहां प्रसिद्ध कांवर यात्रा भी निकाली जाती है।
यहां मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर वात्सायन के कामसूत्र की तरह कई मैथुनरत मूर्तियां बनी हुई हैं। जिसमें अलग अलग मुद्राओं में नायक नायिकाएं बनाई गई है।
इसके पीछे मत है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से जीवन की पूर्णता है। इसके अलावा यहां भारतीय स्थापत्य और कला की मनमोह आकृतियां नजर आती हैं।
इस मंदिर में खजुराहो के मंदिरों की झलक दिखाई देती है। इसलिए इस मंदिर को “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है। जिसके कारण यहां विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं।
यहां एक और मंदिर है, जिसे मड़वा महल कहा जाता था। जिसे 14वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने बनवाया था। वहां पर भी कई तरह की प्रतिमाएं दीवारों पर बनाई गई थी। मंदिर नागर शैली का एक सुन्दर उदाहरण है।
मंदिर में तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है. मंडप के बीच में 4 खंबे हैं तथा किनारे की ओर 12 खम्बे हैं, जिन्होंने मंडप की छत को संभाल रखा है। सभी खंबे बहुत ही सुंदर एवं कलात्मक हैं।
इसके समीप एक छेरकी महल भोरमदेव में मंदिर परिसर में ही स्थित है। यह मंदिर भोरमदेव एवं मंडवा महल की अपेक्षा छोटा है। स्थानीय नागवंशी राजा द्वारा इस मंदिर का निर्माण लगभग 14 शताब्दी में करवाया गया था।

यह तीनों मंदिर राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण संस्कृति विभाग द्वारा संरक्षित है।