वैक्सीनेशन ड्राइव में शहरी और ग्रामीण भारत की खाई हुई और चौड़ी, जानिए कैसे ?
नई दिल्ली, 7 जून: देश के सबसे पिछड़े 114 जिलों में लोगों को कोरोना वैक्सीन की अबतक कुल 2.30 करोड़ डोज लगाई गई है। लगभग इतनी ही डोज देश के सिर्फ 9 बड़े शहरों के लोगों को लगाई गई हैं। ये महानगर हैं- नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, ठाणे और नागपुर। जबकि, इन सभी शहरों की कुल जनसंख्या उन सभी 114 सबसे पिछड़े जिलों की कुल आबादी की आधी संख्या है। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक आजतक देश में वैक्सीन की कुल 23 करोड़ डोज लगाई जा चुकी है। लेकिन, अगर देश के पिछड़े इलाके इस कोविड से बचाओ अभियान में पिछड़ गए तो यह सही स्थिति नहीं होगी।

वैक्सीनेशन में 'भारत' और 'इंडिया' की खाई हुई चौड़ी!
कोरोना के खिलाफ जारी वैक्सीनेशन अभियान में देश के सबसे पिछड़े जिले तब और पिछड़ने लगे जब, पिछले महीने से 45 साल से कम उम्र की श्रेणी के लिए वैक्सीन की डोज वैक्सीन कंपनियों को सीधे निजी अस्पतालों को भी बेचने की अनुमति मिल गई। सरकारी आंकड़ों को देखें तो इसकी वजह से पूरे मई महीने में सिर्फ 9 शहरों को ही उन सभी पिछड़े जिलों को मिली कुल वैक्सीन से 16 फीसदी ज्यादा डोज मिले। क्योंकि, बड़े शहरों में ही निजी अस्पतालों का चेन मौजूद है। मसनल, महाराष्ट्र के सतारा जिले के 38 साल के एक किसान अतुल पवार का कहना है, 'शहर में मेरे दोस्तों ने प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवा ली।........मैं भी पैसे देने के लिए तैयार हूं, लेकिन डोज उपलब्ध नहीं है और लॉकडाउन के चलते जिले की सीमाएं सील हैं। ' पिछले शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बयान में कहा था कि वैक्सीन की असमानता की रिपोर्ट 'गलत और अनुमानों पर आधारित हैं।'

वैक्सीन नीति बदलने से पिछड़े जिलों की और बढ़ गई दिक्कत
देश की 130 करोड़ की अनुमानित आबादी की दो-तिहाई से ज्यादा जनसंख्या आज भी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ये सही है कि शहरी इलाकों में कोविड-19 के कंफर्म केस बहुत ज्यादा संख्या में सामने आए। लेकिन, कई लोगों का अनुमान है कि ग्रामीण इलाकों के सही आंकड़े इसलिए मौजूद नहीं हैं, क्योंकि वहां उस तरह से टेस्टिंग नहीं की गई। इसी दौरान अप्रैल और मई महीने में देश ने कोविड संक्रमण का अप्रत्याशित दौर देखा, जिसके चलते टीकाकरण अभियान पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक जोखिम वाले उम्र के लोगों, हेल्थकेयर वर्करों और 45 साल से ऊपर के लोगों को मुफ्त वैक्सीन लगाने का ऑफर दिया। पिछले महीने से राज्यों को भी युवा आबादी के लिए वैक्सीन खरीदने की नीति लागू हुई। लेकिन, इस दौरान गरीब कहलाने वाले राज्यों ने परेशानियां बढ़ने की शिकायतें शुरू की। मसलन, झारखंड ने पीएम मोदी से हर उम्र के लोगों के लिए मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाने की गुहार लगाई, क्योंकि उसके ज्यादातर जिले पिछड़े की श्रेणी में आते हैं।

ये भी रहे ग्रामीण भारत के पिछड़ने के कारण
जानकारी के मुताबिक कई राज्यों में 45 साल से ऊपर की उम्र श्रेणी के लिए ज्यादातर या सारी डोज शहरी इलाकों में उपलब्ध करवाई गई। कुछ राज्यों का कहना है कि यह स्वाभाविक है कि इंफेक्शन भीड़भाड़ वाले शहरों में ही तेजी से फैलता है। मसलन, ओडिशा के हेल्थ डायरेक्टर बिजय कुमार महापात्रा ने कहा है कि प्रदेश में शहरों को 'इनकी ज्यादा-पॉजिटिविटी के कारण' प्राथमिकता दी जा रही है। इस दौरान कई बड़ी देसी और अंतरराष्ट्र कंपनियों जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट, पेप्सी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी ग्रुप और टाटा मोटर्स ने निजी अस्पतालों के साथ पार्टनरशिप करके टीकाकरण शुरू किया। ये सारी कंपनियां भी बड़े शहरों में ही मौजूद हैं। इसके अलावा वैक्सीनेशन के लिए ऑनलाइन सिस्टम में हाथ तंग होने और शहरियों के मुकाबले ग्रामीण लोगों में वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट ने भी खेल और बिगाड़ दिया।

सुप्रीम कोर्ट भी कर चुका है सरकारी नीति की आलोचना
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी वैक्सीनेशन प्रोग्राम को हैंडल करने के केंद्र सरकार के तरीके पर सवाल उठाया। 31 मई के अपने आदेश में सर्वोच्च अदालत ने कहा, 'निजी अस्पताल (पूरे देश में) एक तरह से नहीं फैले हैं...' कोर्ट ने कहा कि ऐसे अस्पताल ज्यादातर बड़े शहरों तक ही सीमित हैं, जहां जनसंख्या ज्यादा है। अदालत ने कहा कि इसके चलते गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा वैक्सीन उपलब्ध हो रहा है। इसका परिणाम ये भी होगा कि निजी अस्पताल लाभ के लिए निजी कंपनियों के कर्मचारियों पर ज्यादा ध्यान देंगे। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसीन एंड कम्यूनिटी हेल्थ के हेड डॉक्टर राजीब दासगुप्ता का इस हालात पर कहना है, इससे असमानता बढ़ने का खतरा है, 'यह ग्रामीण आबादी को तुलनात्मक तौर पर अधिक असुरक्षित बना सकता है।' शायद इसी स्थिति को पटरी पर लाने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों पर से वैक्सीन खरीदने का बोझ हटाकर फिर से पूरी तरह से अपने कंधे पर ले लिया है, जिसकी घोषणा खुद पीएम मोदी ने सोमवार को राष्ट्र के नाम संदेश में किया है।












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