वट सावित्री पूजा (4 जून) : पिया की लंबी उम्र और तरक्की के लिए व्रत

भारत में स्त्रीत्व के साथ सौभाग्य का जुडाव हमेशा से ही रहा है। इसी सौभाग्य को अखंड रखने के लिए ये महिलाएं तमाम व्रत तीज चौथ पूजा वगैरह करती है। इन्ही में से एक है वट सावित्री व्रत पूजा जिसे बरगदाही या बडअमावस भी कहते हैं| इसकी तिथि को लेकर अलग अलग जगहों पर अलग अलग वर्णन हैं। आमतौर पर जेठ मास की अमावस्या को यह व्रत किया जाता है। तिथियों में अंतर होने के बाद भी इस व्रत का उद्देश्य है सौभाज्ञ की वृद्धि और पतिव्रत धर्म का पालन करना।

वट सावित्री पूजन: जानिए महत्व

Vat Savitri vrat or Vat Purnima ( 4th June) in Hindi

तीनों देव वास करते हैं वट वृक्ष में

इस व्रत में सावित्री और वत वृक्ष दोनों का ही बड़ा महत्व है | कहते हैं बरगद के पेड़ में तीनों देवों का वास है | दार्शनिक दृष्टि से देखें तो वट वृक्ष दीर्घायु व अमरता के प्रतीक के नाते भी स्वीकार किया जाता है। वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना। महिलाएँ व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं।

सावित्री ने यम से मांग लिए अपने पति के प्राण

प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिंदू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं।

पत्नी धर्म का पालन किया

उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी। तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के ये तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा।

सत्यवान को मिला नया जीवन

सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। वट सावित्री अमावस्या के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन और व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की ही मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।

पढ़ें: आंचल श्रीवास्तव के लेख वनइंडिया पर

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