• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

Vat savitri 2021: अटल सौभाग्य का प्रतीक है वट सावित्री व्रत, जानिए खास बातें

By गजेंद्र शर्मा
|
Google Oneindia News

नई दिल्ली, 5 जून। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वटसावित्री व्रत किया जाता है। यह स्ति्रयों का महत्वपूर्ण व्रत है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इसी व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज के पाश से छुड़ाया था। यह व्रत 10 जून 2021 को आ रहा है।

Vat savitri 2021: अटल सौभाग्य का प्रतीक है वट सावित्री व्रत

व्रत विधान :वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए। वट वृक्ष की जड़ को पानी से सींचना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, पुष्प तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींचकर तने के चारों ओर कच्चा सूत लपेटकर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद सत्यवान सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उस पर यथााशक्ति रुपये रखकर अपनी सास या सास के समान किसी सुहागिन महिला को देकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

वटसावित्री कथा

पौराणिक कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक तप किया जिससे प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया। तप के प्रभाव से जो पुत्री उत्पन्न हुई उसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री सभी गुणों से संपन्न कन्या थी, जिसके लिए योग्य वर न मिलने के कारण राजा अश्वपति काफी दुखी रहने लगे। एक बार उन्होंने स्वयं पुत्री को वर तलाशने भेजा। इस खोज में सावित्री एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से हुई। द्युमत्सेन उसी तपोवन में रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी क्रूर राजा ने छीन लिया था। सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखकर उन्हें पति के रूप में वरण करने का निर्णय लिया।

आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल कर दी

उधर यह बात जब नारदमुनि को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति के पास पहुंचे और कहने लगे आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल कर दी है। सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा अवश्य है लेकिन अल्पायु है। एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति अति विचलित हो गए। उन्होंने पुत्री को समझाया, लेकिन सावित्री ने यह कहते हुए पिता को इनकार कर दिया कि आर्य कन्याएं जीवन में एक ही बार पति का वरण करती हैं। मैं सत्यवान को अपने पति के रूप में स्वीकार कर चुकी हूं। इसके बाद सावित्री और सत्यवान का विवाह संपन्न हुआ। उधर धीरे-धीरे एक वर्ष बीतने लगा और सावित्री को चिंता सताने लगी कि पति की मृत्यु का समय निकट आ रहा है तो उसने तीन दिन पूर्व ही व्रत रखना प्रारंभ कर दिया।

सत्यवान लकड़ी काटने के लिए चला गया

नारदजी के कहे अनुसार वह दिन आ गया। नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकड़ी काटने के लिए चला गया तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में जाने को तैयार हो गई। सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ा, तो उसके सिर में भयानक पीड़ा होने लगी। वह व्याकुल होकर वृक्ष से नीचे उतर आया। सावित्री को समझ में आ गया कि अब वक्त नहीं बचा है। उसने अपनी गोद में पति का सिर रखकर लिटा लिया। उसी समय दक्षिण दिशा से यमराज आए और सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। पहले तो यमराज ने उसे दैवीय विधान समझाया, लेकिन फिर उसकी पति निष्ठा देखकर उन्होंने वर मांगने को कहा।

सावित्री बोलीं- मेरे ससुर का राज्य छिन गया है

सावित्री ने कहा- मेरे सास-ससुर वनवासी तथा नेत्र ज्योति विहीन हैं। उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा अब तुम लौट जाओ। यमराज की बात सुनकर सावित्री ने कहा- धर्मराज मुझे अपने पति के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होंने फिर से उसे एक वर मांगने को कहा। सावित्री बोली मेरे ससुर का राज्य छिन गया है उसे वे पुनः प्राप्त कर सकें। धर्मराज ने उसे तथास्तु कहकर लौट जाने को कहा। किंतु वह फिर भी नहीं मानी।

सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा

यमराज सावित्री की मंशा जान गए और बोले कि अब पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो। इस बार सावित्री ने अपने को सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर यमराज पुनः आगे बढ़ने लगे तो सावित्री ने कहा कि आपने मुझे सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं किस प्रकार मां बन सकती हूं। सावित्री की बात से धर्मराज स्वयं धर्म संकट में फंस गए और उन्होंने सावित्री से देर तक तर्क करने के बाद सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया। इस प्रकार सत्यवान और सावित्री कई वर्षों तक सुखी-दांपत्य जीवन का भोग करते रहे।

English summary
Vat Purnima or Wat Purnima or Vat savitri Puja will be celebreted on 10th June This Year.here is Katha and Puja Vidhi.
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X