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Varuthini Ekadashi 2020: सौभाग्य और दीर्घायु प्रदान करता है वरूथिनी एकादशी व्रत

By Pt. Gajendra Sharma
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नई दिल्ली। वैशाख माह के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी कहा जाता है। जो लोग वैशाख स्नान कर रहे हैं, उनके लिए यह एकादशी बहुत महत्वपूर्ण है और जो लोग वैशाख स्नान नहीं कर रहे हैं उन्हें भी इस माह की दोनों एकादशियों का व्रत अवश्य करना चाहिए। वरूथिनी एकादशी 18 अप्रैल 2020, शनिवार को आ रही है। पद्म पुराण में इस एकादशी का महत्व बताते हुए कहा गया है कि संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं, ऐसी कोई इच्छा नहीं जो वरूथिनी एकादशी व्रत करने से पूरी ना होती हो। अर्थात जो मनुष्य वरूथिनी एकादशी का व्रत करता है वह पृथ्वी पर रहते हुए समस्त प्रकार के सुख भोगता है। इस एकादशी को सौभाग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाली भी कही गई है। अविवाहित युवक-युवतियां यदि विवाह की कामना लेकर इस व्रत को करें तो शीघ्र ही उनका विवाह होता है।

वरूथिनी एकादशी की कथा

वरूथिनी एकादशी की कथा

पुराण कथा के अनुसार एक समय नर्मदा किनारे एक राज्य था जिस पर राजा मांधाता राज किया करते थे। राजा बहुत ही धर्मात्मा थे और उनकी दालशीलता की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वे भगवान विष्णु के अनन्य उपासक थे। एक बार राजा जंगल में तपस्या के लिए गए और एक विशाल वृक्ष के नीचे आसन लगाकर तपस्या में लीन हो गए। उसी दौरान एक विशाल जंगली भालू ने उन पर हमला कर दिया और राजा के पैरों को अपने जबड़े में दबाकर चबाने लगा। तपस्या में होने के कारण मांधाता संयमपूर्वक बैठे रहे। जब भालू उन्हें घसीट कर ले जाने लगा तो राजा ने तपस्वी धर्म का पालन करते हुए क्रोध नहीं किया और भगवान विष्णु से इस संकट से रक्षा करने की विनती की। राजा की तपस्या से प्रसन्न् भगवान विष्णु तुरंत प्रकट हुए और भालू को अपने सुदर्शन चक्र से मार दिया लेकिन तब तक भालू राजा के पैर को लगभग पूरा चबा चुका था। राजा बहुत दुखी थे दर्द में थे। भगवान विष्णु ने कहा कि वत्स परेशान ना हो वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर मेरे वराह रूप की पूजा करना। व्रत के प्रताप से तुम पुनः संपूर्ण अंगों वाले हष्ट-पुष्ट हो जाओगे। भालू ने जो भी तुम्हारे साथ किया यह तुम्हारे पूर्वजन्म के पाप का फल है। इस एकादशी के व्रत से तुम्हें सभी पूर्व जन्म के पापों से भी मुक्ति मिल जाएगी। मांधाता ने व्रत किया और वह पूर्व की तरह स्वस्थ हो गया। व्रत के प्रताप से राजा की कीर्ति भी चारों ओर फैल गई और उसका राज्य समृद्ध राज्य बन गया।

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वरूथिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

वरूथिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

वरूथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा का विशेष महत्व है। एकादशी का व्रत रखने के लिए दशमी के दिन रात्रि भोजन ना करें। दशमी के दिन उड़द, मसूर, चना, शाक, शहद, किसी दूसरे का दिया हुआ अन्न् या भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस दिन खरबूजे का फलाहार करने का महत्व है। एकादशी के दिन प्रातः काल स्नानादि के पश्चात सूर्य को अर्घ्य दें और व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करें और वरूथिनी एकादशी व्रत की कथा सुनें। द्वादशी के दिन किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।

वरूथिनी एकादशी व्रत के लाभ

वरूथिनी एकादशी व्रत के लाभ

  • इस व्रत को करने से अनजाने में किए गए पूर्व जन्म के पापों से भी मुक्ति मिलती है।
  • इस व्रत के प्रभाव से दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • स्त्री-पुरुष यदि अपनी संतानों की आयु वृद्धि की कामना से व्रत करें तो संतान दीर्घायु होती है।
  • यह व्रत सौभाग्य प्रदाता माना गया है। विवाहित स्त्रियां इस व्रत को करके सौभाग्यवती होती हैं।
  • अविवाहित युवक-युवतियों को इस व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही विवाह का सुख प्राप्त होता है।
  • धन, संपत्ति प्रदान करता है यह व्रत।

वरूथिनी एकादशी कब से कब तक

  • एकादशी प्रारंभ 17 अप्रैल रात्रि 8.03 बजे से
  • एकादशी पूर्ण 18 अप्रैल रात्रि 10.17 तक
  • एकादशी पारण 19 अप्रैल प्रातः 8 से 10 बजे तक

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English summary
Varuthini Ekadashi, also known Baruthani Ekadashi, is a Hindu holy day, which falls on the 11th lunar day (ekadashi) of the fortnight of the waning moon in the Hindu month of Chaitra.
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