Tulsi Vivah 2021: जानिए तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त और कथा
नई दिल्ली, 14 दिसंबर। आज कार्तिक मास की एकादशी यानी कि 'देवउठनी एकादशी' है, जिसे कि 'देवोत्थान एकादशी' या 'देवप्रबोधिनी एकादशी' भी कहा जाता है। आज विष्णु पूजा के साथ-साथ तुलसी विवाह भी किया जाता है। आज के बाद से ही सारे मंगल कार्य शुरू हो जाते हैं क्योंकि आज से भगवान विष्णु चार महीने बाद योग निद्रा से उठते हैं। वैसे इस बार तुलसी विवाह को लेकर थोड़ा असमंजस हैं। क्योंकि कुछ जगह तुलसी विवाह आज है तो कुछ लोग ये विवाह कल कराएंगे। दरअसल एकदशी के हिसाब से तो तुलसी विवाह आज ही है लेकिन जो लोग द्वादशी तिथि में तुलसी विवाह करते हैं, वह तुलसी विवाह 15 नवंबर को करेंगे।

तुलसी विवाह (Tulsi Vivah) शुभ मुहूर्त 2021
- तुलसी विवाह तिथि- 14 नवंबर
- द्वादशी तिथि आरंभ- 15 नवंबर, सुबह 06 : 39 AM
- द्वादशी तिथि समाप्त- 16 नवंबर,सुबह 08 : 01 AM

क्या है कथा?
आपको बता दें कि आज के दिन को मां तुलसी और भगवान शालिग्राम की शादी का दिन माना जाता है। हिंदू धर्म मानने वालों के लिए आज का दिन एक उत्सव की तरह होता है। घरों में पकवान बनते हैं और मां तुलसी को एक दुल्हन की तरह सजाकर शालिग्राम से उनकी शादी कराई जाती है। घरों में रंगोली सजाई जाती है। कहीं-कहीं मां तुलसी और शालिग्राम को खीर-पूड़ी का भोग लगता है।
सती वृंदा ने भगवान विष्णु को दिया श्राप
दरअसल पौराणिक कथानुसार के जगत की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के सतीत्व को भंग कर दिया था। इस पर सती वृंदा ने उन्हें पत्थर बनने का श्राप दे दिया था। इस श्राप से मुक्त होने के लिए भगवान विष्णु को शालिग्राम रूप में तुलसी माता से शादी करनी पड़ी थी, वो दिन एकादशी का था इसलिए 'देवउठनी एकादशी' के दिन तुलसी विवाह होता है। तुलसी विवाह के वक्त इन मंत्रों का जाप करना चाहिए इससे मां तुलसी और प्रभु शालिग्राम प्रसन्न होकर सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं।
तुलसी मंत्र
- वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
- पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।।
- एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
- य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फलंलमेता।।

कैसे करें विवाह
भक्तगण आज के दिन व्रत भी रखते हैं। वो नहा-धोकर मां तुलसी को चुनरी, कुमकुम, हल्की, सिंदूर, चूड़ी, बिंदी और फूल से सजाते हैं। उसके बाद उनके निकट शालिग्राम जी को रखकर हल्दी-कुमकुम लगाते हैं और कलेवा चढ़ाते हैं। फिर दोनों को मिष्ठान अर्पित करते हैं। इस बाद मां तुलसी की चुनरी और शालिग्राम पर चढ़े कलेवा की गांठ लगाते हैं और मां तुलसी की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद आरती होती है और प्रसाद का वितरण होता है।












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