सिर्फ जन्माष्टमी पर ही खुलता है यह मंदिर

इस प्राचीन मंदिर में बाल स्वरुप के भाव से सेवा होती है। इस दिन ठाकुर जी के प्रसादी वस्त्र का वितरण भी किया जाता है। मान्यता है कि जो भाग्यशाली लोगों को ही मिल पाता है। वृन्दावन के ही राधा दामोदर मंदिर में जन्माष्टमी कृष्णोत्सव के रुप में दिन में ही मनायी जाती है। कई मन पंचामृत, पंच मेवा एवं औषधियों से महाभिषेक किया जाता है और मंदिर का वातावरण कान्हा के जन्म गीतों से गूंज उठता है।
मंदिर के महंत जगमोहन से भक्तों पर हल्दी मिश्रित दही पानी का घोल डालते हैं जिस पर यह प्रसाद पड़ जाता है धन्य हो जाता है। महाभिषेक के बाद विग्रहों का अदभुत श्रंगार होता है तथा रसिया और भजनों का रंगारंग कार्यक्रम होता है। अगले दिन मंदिर प्रांगण में मटकी फोड़ लीला होती है। वृंदावन के अलावा मथुरा में भी यह उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। द्वारकाधीश मंदिर में रात 12 बजे अभिषेक होता है। अभिषेक का चरणामृत ग्रहण करने के बाद गिरि गोवर्धन की सप्तकोसी परिक्रमा करने की होड़ सी लग जाती है।
गोकुल की जन्माष्टमी निराली ही होती है। वहां के कार्यक्रमों में एक बार द्वापर फिर गोकुल में उतर आता है। गोकुलनाथ मंदिर और राजा ठाकुर मंदिर में सेवायत आचार्य यशोदा के रुप में जब मंदिर के गर्भगृह और जगमोहन से सामान लुटाते हैं तो इसे लूटने के समय ऊंच-नीच का विचार ही खत्म हो जाता है। लोग इस प्रसाद को अपने घर में अवश्य ले जाना चाहते हैं।
कन्हैया के आगमन पर जहां गोकुल को नई नवेली दुल्हन की तरह सजाया जाता है। वहीं मंदिरों में हल्दी, पानी एवं दही के मिश्रण से एक प्रकार से होली होती है तथा भक्तों में मिठाई, फल, खिलौने और रुपये लुटाए जाते हैं। मंदिरों से शुरू होकर यह महोत्सव गोकुल की चौक पर पहुंचता है जहां कन्हैया के आगमन पर ग्वाल बाल एक-दूसरे पर उक्त मिश्रण डालकर प्रसन्न होते हैं।












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