ग़ालिब की दिल्ली बेज़बानी का शिकार

Javed Wasim

मिर्ज़ा एबी बेग

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, दिल्ली से

भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर चाहे जो भी गुल खिल रहे हों या राजनीतिक गलियारों में जो भी बातें हो रही हों लेकिन हिंदुस्तान के दिल दिल्ली में आयोजित मुशायरे कुछ दूसरी ही तस्वीर बयान करते हैं.

इस बार मोहब्बत के गीत लिए फ़राज़ नहीं थे, न ही सभी को हंसाने वाले साग़र ख़्यामी ही थे लेकिन विश्व भर में प्रसिद्ध शंकर-शाद मुशायरे की हिंद-पाक दोस्ती की रवायत बरक़रार रही क्योंकि पाकिस्तान की मशहूर शायरा ज़हरा निगाह और पीरज़ादा क़ासिम मौजूद थे.

शंकर-शाद मुशायरा विश्व भर में उर्दू के सबसे बड़े और लोकप्रिय मुशायरों में से एक है और शनिवार की रात इसका 46वां आयोजन था. यह मुशायरा दो हिंदू शायरों सर शंकरलाल शंकर और लाला मुरलीधर शाद की याद में आयोजित किया जाता है जो उर्दू के सेकूलर चरित्र को पेश करता है.

मुशायरा दिल्ली में हो और दिल या दिल्ली की बात न हो ऐसा मुमकिन ही नहीं. अनवर जलालपुरी ने दिल्ली पर एक नज़्म पेश की.

कुछ यक़ीं कुछ गुमान की दिल्ली
अनगिनत इम्तिहान की दिल्ली
ख़्वाब, क़िस्सा, ख़्याल, अफ़साना
हाए उर्दू ज़बान की दिल्ली
बेज़बानी का हो गई है शिकार
असदुल्लाह ख़ान की दिल्ली
एक और शेर में उन्होंने दिल्ली का हवाला पेश किया...
दरो-दीवार पे सबज़े की हुकूमत है यहां
होगा ग़ालिब का कभी अब तो ये घर मेरा है

जहां ग़ालिब पर बात हुई वहीं दिल्ली के अमीर ख़ुसरो और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को भी याद किया गया. मेराज फ़ैज़ाबादी ने कहा

मैं भी ख़ुसरो की तरह शेर कहूं रक़्स करूं
काश मुझको कोई महबूबे-इलाही मिल जाए

भारत-पाकिस्तान रिश्तों के हवाले से भी कुछ पंक्तियां सुनने को मिलीं जिन्हें लोगों ने काफ़ी पसंद किया. जैसे-

बदलते जाएंगे चाल अपनी, प्यादे कबतक वज़ीर कब तक
जलेगा नफ़रत की आग में ये हमारा बर्रे-सग़ीर कब तक
(यानी हमारा उप-महाद्वीप नफ़रत की आग में कब तक जलेगा)

अब जहां प्यादे-वज़ीर की बात आई है तो कहता चलूं कि गीतकार जावेद अख़्तर ने अपनी नज़्म 'खेल" सुनाई जो कि शतरंज की मुहरों और चालों से बुनी गई नज़्म थी. बहरहाल पहली बार शायरों की सूची इतनी कम थी कि मुशायरा सुनने वालों को मज़ा नहीं आया.

मुशायरों का लुत्फ़ लेने वाले एक श्रोता डॉक्टर इरशाद नैयर ने कहा, “भारत की साझा संस्कृति की परंपरा में मुशायरा सुनने वालों की तो एक भी सीट ख़ाली नहीं थी लेकिन स्टेज पर शायरों की कमी ज़रूर थी."

उनका कहना था, “कहीं हमारे यहां शायरों की कमी तो नहीं हो गई. बहरहाल पाकिस्तान के मेहमान शायरों ने मुशायरे के शमा की लौ ऊंची रखी." ज़हरा निगाह ने अपनी मशहूर नज़्म 'गुल बादशाह" तो पढ़ी ही. इस बार उन्होंने एक नज़्म 'गुल ज़मीनह" सुनाई जिसमें पाकिस्तान में बम से तबाह कर दिए जाने वाले एक स्कूल का ज़िक्र था.

गुल-ज़मीनह सुनो !
गुल ज़मीनह सुना !
तोदा-ए-ख़ाक पर
अपनी कोंपल सी उंगली से क्या लिख रही हो

उसने शरबत भरी आंख ऊपर उठा कर कहा
कुछ ही दिन क़ब्ल ये तोदा-ए-ख़ाक मेरा स्कूल था.....

परंपरा

मुशायरे का आरंभ परंपरागत तौर पर दीप जलाकर किया गया. मुशायरे की अध्यक्षता योजना आयोग की सदस्या सैयदा हमीद ने की. मुशायरे के शुरू में परंपरागत तौर पर शंकर और शाद की ग़ज़लों की कुछ पंक्तियां भी सुनाई गईं.

शाद और शंकर के बारे में उर्दू में कहा जाता है कि वो एक शेर के दो मिसरों यानी दो पंक्तियों की तरह हैं जहां दोनों मिसरे पढ़े जाते हैं वहीं शेर पूरा हो जाता है. कुछ पसंद किए जाने वाले शेर आप भी सुनें

हमारी तरहा कोई दूसरा हुआ भी नहीं
वो दर्द दिल में रखा है जो ला दवा भी नहीं
मैं ऐसे शख़्स को ज़िन्दों में क्यों शुमार करूं
जो सोचता भी नहीं ख़्वाब देखता भी नहीं
ये अस्रे-नौ की चिताओं में आग कैसी है
कि रूह राख हुई और बदन जला भी नहीं
ग़ुबार, बारूद, रक़्से-शोला, धमाल मिज़ाइलों का पैहम
ये कैसा मंशूरे-अमने-आलम हवा पे तहरीर कर दिया है
ख़न से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ

फिर मुझे दे दिया गया एक दिया बुझा हुआ (पीरज़ादा क़ासिम, पाकिस्तान)
ये पत्थर तो बड़ा हस्सास निकला

जो मुझको ज़ख़्म दे कर रो रहा है (नईम अख़्तर, बुरहानपुर)
सारी ख़ुशी जहेज़ के शोलों में जल गई

रुख़सत किया था मां ने तो अपनी दुआ के साथ (तेजेंदर, पंजाब)
बहुत बर्बाद कर डाला है हम दोनों को नफ़रत ने

उठो लफ़्ज़े-मोहब्बत लिख के सजदा कर लिया जाए (अनवर जलालपुरी)

वसीम बरेलवी, शहरयार और जावेद अख़्तर ने फ़रमाइशों पर अपनी पुरानी नज़्में और ग़ज़लें भी सुनाईं.

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