Ravi Pradosh Vrat 2019: दीर्घायु की प्राप्ति के लिए करें रवि प्रदोष व्रत

नई दिल्ली। भगवान शिव के व्रत-उपवासों में सबसे प्रमुख है प्रदोष व्रत। प्रदोष व्रत जब रविवार के दिन आता है तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है। रविवार के दिन आने के कारण इसे रवि प्रदोष या भानु प्रदोष भी कहा जाता है। रवि प्रदोष व्रत 30 जून को आ रहा है। इस व्रत को करके लंबा और निरोगी जीवन प्राप्त किया जा सकता है। यह व्रत रोग और जीवन के सारे दुख, संकट दूर करके व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। चूंकि प्रदोष काल सायं का समय होता है इसलिए इस दिन शिवजी का पूजन शाम के समय किया जाता है।

कैसे करें रवि प्रदोष व्रत?

कैसे करें रवि प्रदोष व्रत?

रवि प्रदोष व्रत के दिन व्रती प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रम से निवृत होकर स्नान करे और शिव जी का पूजन करे। पूरे दिन मन ही मन ऊं नमः शिवाय मंत्र का जप करते रहे। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिवजी का पूजन करे। रवि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4.30 बजे से शाम 7.00 बजे के बीच की जाना चाहिए।

व्रती पुनः स्नान करें

शाम को पूजन के लिए व्रती पुनः स्नान करे और स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को पोछा लगाकर शुद्ध कर ले। गंगाजल या गौमूत्र छिड़कर पवित्र कर ले। इसके बाद पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिवजी की पूजा विधि-विधान से करें। ऊं नमः शिवाय मंत्र बोलते हुए शिवजी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर शिवजी का ध्यान करें। मन ही मन अपने जीवन के संकटों के नाश और धन धान्य की प्राप्ति के लिए शिवजी से प्रार्थना करें। ध्यान के बाद, रवि प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा पढ़ें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार ऊं ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा मंत्र से आहुति दें। शिवजी की आरती करें। प्रसाद वितरित करें। उसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

रवि प्रदोष व्रत कथा

रवि प्रदोष व्रत कथा

एक ग्राम में एक दीन-हीन ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी धर्मनिष्ठ थी और प्रदोष व्रत किया करती थी। उनका एक पुत्र था। एक बार वह पुत्र गंगा स्नान करने गया। रास्ते में उसे लुटेरों ने घेर लिया और डराकर पूछने लगे कि उसके पिता का गुप्त धन कहां रखा हुआ है बता। बालक ने दीनतापूर्वक बताया कि हम अत्यंत निर्धन और दुखी हैं, हमारे पास गुप्त तो क्या प्रकट रूप से ही कोई धन नहीं है। लुटेरों ने उसकी यह बात सुनकर उस पर तरस खाकर छोड़ दिया।

जब ब्राह्मणी का लड़का घर नहीं पहुंचा...

बालक अपने रास्ते चल दिया। रास्ते में जब वह थककर चूर हो गया तो एक बरगद के पेड़ के नीचे सो गया। तभी उस नगर के सिपाही लुटेरों को खोजते हुए उसी रास्ते आए। उन्होंने ब्राह्मण-बालक को चोर समझकर बंदी बना लिया और राजा के सामने पेश किया। राजा ने उसकी बात सुने बगैर उसे कारागार में डलवा दिया। जब ब्राह्मणी का लड़का घर नहीं पहुंचा तो उसे बड़ी चिंता हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया और भगवान शंकर से मन ही मन अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी।

'तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है'

'तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है'

उसी रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि वह बालक निर्दोष है। यदि उसे नहीं छोड़ा गया तो तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा। सुबह जागते ही राजा ने बालक को बुलाकर घर-परिवार के बारे में पूछताछ की और फिर उसके माता-पिता को दरबार में बुलवाया। उन्हें भयभीत देख राजा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है। तुम्हारी दरिद्रता के कारण हम तुम्हें पांच गांव दान में देते हैं।' इस तरह ब्राह्मण आनंद से रहने लगा। शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता भी दूर हो गई और उनके पुत्र का जीवन भी बच गया।

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