कविता: अश्कों में खोता बचपन....

धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन,
भूखे पेट, तरसती आँखे,
फिर भी मुस्कुराती ज़िन्दगी, चमकती आँखे,
कभी किताबों तो कभी फूलों को बेचने की जुगत में खोता बचपन,
तो कभी लाचारी और अपंगता में खोता बचपन,
क्यूँ रोती, बिलखती ज़िन्दगी, क्यूँ सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, क्यूँ अश्कों में खोता बचपन...
भूखे पेट, तरसती आँखे, दो रुपये, तरसती सांसें,
क्यूँ धुओं में खोता बचपन, चोरी, नशा और ज़ुल्म में पड़,
सड़कों पर रोता बचपन, ये रोती, बिलखती ज़िन्दगी,
ये सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन...
बाबूजी, एक रूपया दे दो,
कहके आया पास मेरे,
चेहरे पर मोती, पेट में भूख,
ले आया वो पास मेरे,
मैंने पुछा, क्या होगा जो एक रूपया मैं दे दूंगा,
बोला वो, एक रूपया जोड़, माँ का पेट मैं भर लूँगा,
गुज़र गया आँखों के आगे, क्यूँ उसका सारा बचपन,
हाँथ जोड़ क्यूँ खड़ा रहा, आँखों के आगे सारा बचपन,
ये रोती, बिलखती ज़िन्दगी, ये सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन.












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