क्या मुसलमान बांधते हैं कलावा? जानिए इसके बारे में सबकुछ
दिल्ली में नाबालिग साक्षी की हत्या करने वाले साहिल ने धर्म छिपाने के लिए कलावा बांधा था। ऐसे में सवाल उठ रहा कि क्या मुसलमान कलावा नहीं बांधते, जानें क्या है सच्चाई?

दिल्ली के शाहाबाद डेयरी के पास रविवार को एक 16 वर्षीय लड़की साक्षी की मोहम्मद साहिल खान नाम के लड़के ने बेरहमी से हत्या कर दी। 20 साल के साहिल ने पहले चाकू से साक्षी पर 20 से अधिक बार वार किया इसके बाद उसके मुंह और सिर को पत्थर से कुचलकर पैर से उसकी लाश नाली में ढकेल दी। साक्षी की हत्या करने वाला साहिल खान अपनी धार्मिक पहचान छिपाने के लिए अपनी कलाई में कलावा पहनता था।

साहिल के हाथ में कलावा बांधे हुए फोटो सामने आने के बाद कहा जा रहा है कि उसने अपना धर्म छिपाने और स्वयं को हिंदू बताने के लिए हाथ में कलावा पहना था। जिसके बाद बहस छिड़ गई है कि क्या केवल हिंदू ही अपनी कलाई में कलावा पहनते हैं कि मुसलमान धर्म को मानने वाले भी कलावा पहनते हैं। आइए जानते हैं क्या है सच?
जानें क्या कहते हैं इस्लाम धर्म के जानकार
वरिष्ठ पत्रकार और इस्लाम धर्म के जानकार नावेद शिकोह का इस बारे में कहना है कि मुसलमानों में शिया और सुन्नी दो समुदाय प्रमुख हैं। जबकि सुन्नी समुदाय में मुख्यता देवबंदी और बरेलवी दो मसलक हैं। शिया समुदाय में कलाई में कलावा जैसा मन्नत का धागा बांधा जाता है। इसी तरह बरेलवी मसलक के लोग भी मजारों, दरगाहों पर अकीदा रखते हैं और यहां भी धागा बांधने की परंपरा है।
मुस्लिम धर्म में क्यों बांधा जाता है कलावा
इसके पीछे मुसलमानों में भी वैसी ही मान्यता है जैसी हिंदू धर्म में है। व्यक्ति की रक्षा के लिए ये कलावा मुस्लिम धर्म के लोग भी बांधते हैं। मुस्लिम धर्म के लोग भी अपने हाथ में कलावा बांधते हैं। ये बिलकुल वैसा ही कलावा होता है जैसा कि हिंदू धर्म में पूजा -पाठ के बाद कलाई में बांधा जाता है।
साहिल की नानी ने कलावा बांधने को लेकर बोली ये बात
वहीं साहिल खान जिसने साक्षी की हत्या की उसकी लड़के की नानी जो दिल्ली में उसकी इलाके में रहती हैं, उनसे जब उनसे पूछा गया कि साहिल ने अपनी पहचान छिपाने के लिए क्या अपनी कलाई में कलावा बांधता था? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वो हमारे यहां पिछले दो साल से नहीं आया लेकिन जहां तक कलावा बांधने की बात है तो हमारे यहां भी दरगाह या मजार पर मिलने वाला कलावा कलाई पर बांधा जाता है।
हिंदू धर्म में कलावा बांधने का है धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में पूजा, अनुष्ठान, कथा के बाद हाथ में मंत्रोच्चारण के साथ कलाई पर जो कलावा बांधा जाता है जिसे मौली या रक्षा सूत्र भी कहा जाता है उसका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। कलावा दो तरह कहा होता जिसमें एक में तीन रंग के धागे होते हैं यानी त्रिदेव। तीन रंग लाल, पीला और हरा से बना कलावे के ये तीन रंग ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी माना जाता है हिंदू धर्म में मान्यता है कि कलावा बांधने से ये तीनों देवता के साथ तीनों देवियां मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और माता पार्वती प्रसन्न होती हैं। ये रक्षा के साथ मनौती के लिए बांधा जाता है।ऐसे ही पांच रंग वाला कलावा पंचदेव का प्रातीक माना जाता है। जिसमें लाल, पीला, हरा, नीला और सफेद रंग का धागा होता है।
कलाई में कलावा बांधने का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कलाई में रक्षा सूत्र बांधना लाभकारी इसलिए होता है कि क्योंकि कलाई से हमारे शरीर की कई अंगों का सीधा संपर्क होता है, शारीरिक संरचना का नियंत्रण हाथ की कलाई से होता है। जिसके कारण दिल, फेफड़े, पित्त, कफ, लकवा समेत अन्य गंभीर बीमारियों के लिए भी ये सुरक्षा कवच माना जाता है।
कलावा बांधने के पीछे क्या है पौराणिक मान्यता
कलावा बांधने के पीछे क्या है पौराणिक कथा कि इंद्र भगवान जब वृत्रासुर से युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहे थे तब इंद्राणी ने इंद्र भगवान की दाईं भुजा पर ऐसा ही रक्षा सूत्र बांधा था और वो युद्ध जीत कर सकुशल वापस लौटे थे। तभी से कलाई में तीन बार लपेट कर रक्षा सूत्र बांधने की परंपर हिंदू धर्म में शुरू हुई। मान्यता है कि कलाई पर कलावा बांधने से व्यक्ति और उसक परिवार सारी विपत्तियों से सुरक्षित रहता है।












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