जानिए क्यों मनायी जाती है गुड़ी पड़वा?
हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष 22 मार्च 2012 को रात 7.10 बजे विक्रम संवत् 2069 का प्रारंभ हो गया और इसी के साथ 23 मार्च को देश भर में लोग हिन्दू नववर्ष मना रहे हैं। महाराष्ट्र में इस दिन को गुड़ी पड़वा के नाम से मनाया जाता है। पंडित दयानंद शास्त्री बता रहे हैं कि गुड़ी पड़वा क्यों मनायी जाती है।
चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष आरम्भ होता है। 'गुड़ी' का अर्थ होता है 'विजय पताका'। कहा जाता है कि शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़कर उनमें प्राण फूंक दिए। उसने इस सेना की सहायता से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इसी विजय के प्रतीक के रूप में 'शालिवाहन शक' का प्रारंभ हुआ। महाराष्ट्र में यह पर्व 'गुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है। कश्मीरी हिन्दुओं के लिए नववर्ष एक महत्वपूर्ण उत्सव की तरह है।
संस्कृति से जोड़ता है विक्रम संवत्
गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हम पर ऐसा रंग चढ़ाया ताकि हम अपने नववर्ष को भूल उनके रंग में रंग जाए। उन्ही की तरह एक जनवरी को ही नववर्ष मनाये और हुआ भी यही लेकिन अब देशवासियों को यह याद दिलाना होगा कि उन्हें अपना भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत बनाना चाहिए, जो आगामी 23 मार्च को है।
वैसे अगर देखा जाये तो विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं। दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता है। यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन बाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होना था| आपको बता दें कि इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था।
ये हें 12 महीनों के नाम
ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी द्वारा 365/366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं| हिंदी महीनों के 12 नाम हैं चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
इस साल में चातुर्मास पांच माह का
भारतीय मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवप्रबोधिनी) तक चौमासा माना जाता है। आधा आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और आधा कार्तिक माह बारिश के माने जाते हैं। भाद्रपद दो होने से पूरा एक माह बारिश बढ़ेगा। देवशयनी एकादशी 30 जून 2012 को है और देवप्रबोधिनी एकादशी 24 नवम्बर 2012 को है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए वर्ष 2012 खुशखबर लेकर आया है। वर्ष 2012 में चातुर्मास (वर्षाकाल) पांच महीने का होगा। भाद्रपद दो होंगे यानी हिन्दी महीनों के अनुसार बारिश के समय में सीधे एक माह का इजाफा हो रहा है। विक्रम संवत् 2069 की भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा 18 अगस्त 2012 से अधिक [पुरूषोत्तम] मास शुरू होगा, जो भाद्रपद अमावस्या 16 सितम्बर 2012 तक रहेगा।
ज्यादा समय आराधना का
जैन परम्परा की मानें तो चातुर्मास के आयोजनों में एक माह का इजाफा होने से तप-आराधना का समय एक माह और मिलेगा। इससे अगले साल विभिन्न धार्मिक आयोजनों की अधिकता रहेगी। शास्त्रों के अनुसार अधिक मास का निर्णय अमांत मास (एक अमावस्या के अंत से अग्रिम अमावस्या के अंत तक) आधार पर होता है। हर माह में अलग राशियों की संक्रांति आती है। जिस अमांत मास में किसी राशि की संक्रांति नहीं होती उस मास को अधिक माना जाता है। वर्ष 2012 में भाद्रपद में कन्या संक्रांति नहीं होने पर भाद्रपद अधिक हुआ है।












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