सिखों के चौथे गुरू रामदास जी का जन्मदिवस, प्रकाश पर्व पर दुल्हन की तरह सजा अमृतसर
अमृतसर शहर के संस्थापक और सिखों के चौथे गुरू श्री रामदास जी के जन्मदिवस पर जिसे प्रकाश पर्व या गुरुपर्व के नाम से भी जाना जाता है, उनकी नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया है।
अमृतसर। अमृतसर शहर के संस्थापक और सिखों के चौथे गुरू श्री रामदास जी के जन्मदिवस पर जिसे प्रकाश पर्व या गुरुपर्व के नाम से भी जाना जाता है, उनकी नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया है। अमृतसर में विशाल नगर कीर्तन का आयोजन किया गया है। केवल स्वर्ण मंदिर की ही सजावट के लिए 600 क्विंटल फूल और 13 करोड़ की एलईडी लाइटें मंगाई गई हैं। शुक्रवार को निकाले गए नगर कीर्तन में पूरी दुनिया से लोग 484वें प्रकाश पर्व का हिस्सा बनने पहुंचे।


उबले चने बेचकर किया गुजारा
श्री रामदास जी सिखों के चौथे गुरू थे। इनका जन्म कार्तिक महीने की विक्रमी सम्वत को मनाया जाता है। इनका जन्म लाहौर की चूना मंडी में हुआ था। वो घर में जन्में पहले बच्चे थे इसलिए उन्हें जेठा भी पुकारा जाता था। रामदास जी ने बचपन से ही जीवन नें कठिनाइयां देखी हैं। जब वो सात साल के थे, तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया जिसके बाद वो अपनी नानी के घर बासरके आ गए। यहां जीवन व्यापन के लिए वो सड़कों पर उबले हुए चने बेचने लगे।

रामदास से प्रभावित हुए तीसरे गुरू
बासरके में ही सिखों के तीसरे गुरू श्री अमरदास जी रहते थे। एक दिन उनकी नजर रामदास पर पड़ी और वो उनसे काफी प्रभावित हुए। उन्होंने रामदास को अपनी शरण में रखा। रामदास भी चने बेचने के साथ तीसरे गुरू की सेवा में अपना सारा ध्यान लगाने लगे। रामदास की सेवा और भक्ति से अमरदास इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी छोटी बेटी बीबी भानी का विवाह उनसे करने के तय किया। रामदास शादी के बाद भी लोगों की सेवा में लगे रहे।

रामदास जी ने ही रखी थी स्वर्ण मंदिर की नींव
जब श्री अमरदास जी के पास अपना अगला वारिस चुनने का मौका आया, तो उन्होंने अपने दोनों दामादों की परीक्षा ली। इस परीक्षा में रामदास पास हुए और उन्हें सिखों का चौथा गुरू बनाया गया। श्री रामदास जी ने ही अमृतसर शहर और हरमिंदर साहिब यानि स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। मंदिर का उद्देश्य सिखों के लिए एक ऐसी पवित्र जगह को बनाना था जहां आकर वो पूजा कर सकें। इस काम में उन्होंने सभी सिखों को शामिल होने का निर्देश दिया।

सभी धर्मों के लिए बनवाया हरमिंदर साहिब
1578 में जब पवित्र तालाब का निर्माण पूरा हुआ तो उसका नाम अमृतर पड़ा। श्री रामदासल जी ने हरमिंदर साहब के चारों तरफ दरवाजे बनाए। उनका कहना था कि ये जगह हर धर्म के लोगों के लिए खुली है। उन्होंने ही मंदिर में लंगर की प्रथा शुरू की ताकी कोई भी भूखा न रहे। हरमिंदर साहिब के आसपास बसने वाले शहर को रामसर से जाना जाने लगा, जिसके आज पूरी दुनिया अमृतसर के नाम से जानती है।

सबसे छोटे बेटे को बनाया अगला वारिस
श्री रामदास जी ने 'आनंद कार्ज' की शुरूआत की थी जो आज सभी सिख विवाह के दौरान रस्म निभाई जाती है। उन्होंने लोगों को धर्म और जाति से परे मनुष्य को अपनाने का मार्ग दिखाया। उन्होंने दुनिया को अच्छाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। वो अंधविश्वास और वर्ण व्यवस्था के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे अर्जन साहिप को सिख धर्म का पांचवा गुरू बनाया। 1 सितंबर 1581 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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