Ganga Dussehra 2020: जब पृथ्वी पर पधारी मां गंगा, जानिए पूरी कहानी
नई दिल्ली। करोड़ों भारतवासियों की आस्था की केंद्र मां गंगा ने जिस दिन शिवजी की जटा से निकलकर पहली बार धरती का स्पर्श किया था, वह दिन गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन गंगा में शुद्ध मन और सच्ची श्रद्धा से एक डुबकी लगाने से अनेक जन्मों के पाप कट जाते हैं। इस वर्ष गंगा दशहरा या गंगा दशमी 1 जून 2020 सोमवार को आ रही है। इस पवित्र दिन गंगा के तट पर बड़े मेलों का आयोजन होता है। गंगा अपने पथ पर चलते हुए जहां सागर में मिलती है उस स्थान को गंगा सागर कहा जाता है, इस स्थान पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाने पहुंचते हैं। लेकिन इस बार कोरोना वायरस के कारण चल रहे लॉकडाउन के कारण मेले आयोजित नहीं होंगे। लोग घरों में रहकर ही गंगा स्नान का पुण्य फल प्राप्त करेंगे।

कैसे करें गंगा दशमी का पूजन
गंगा दशमी के दिन गंगा में स्नान करने का महत्व है, लेकिन इस बार यह संभव नहीं हो पाए तो अपने घर में ही नहाने के पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें। इस दौरान गंगा मैया का मानसिक स्मरण्ा करें। इसके बाद शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर मां गंगा की मूर्ति का पूजन करें। इसके साथ ही राजा भगीरथ, हिमालय और शिवजी का पूजन भी किया जाता है। इस दिन गंगाजल से शिवजी का अभिषेक करने से समस्त प्रकार के मनोरथ पूर्ण होते हैं।

क्या है गंगा अवतरण की कथा
एक बार महाराज सगर ने यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया और पाताल लोक में तपस्या कर रहे महर्षि कपिल के आश्रम में छोड़ दिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामत: अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर (कहीं कहीं इन्हें 60 हजार पुत्र बताया गया है।) अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात भगवान महर्षि कपिल के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर चोर-चोर चिल्लाने लगी। महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने नेत्र खोले, सारी प्रजा भस्म हो गई। इन मृत लोगों के उद्धार के लिए महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। भगीरथ के तप से प्रसन्न् होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने गंगा की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने कहा- राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न् किया जाए।

ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा
महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न् होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूटकर गंगाजी हिमालय की घाटियों में मैदान की ओर मुड़ी। इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करवाने में सफल हुए।
क्यों कहा जाता है दशहरा
पुराणों के अनुसार जिस दिन गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था उस दिन दस शुभ योग बने हुए थे और इनके कारण मनुष्य के दस पापों का नाश होता है इसलिए इस दिन को दशहरा कहा जाता है। गंगा दशहरा के दिन ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर योग, आनंद योग, व्यतिपात योग, कन्या का चंद्र, वृषभ का सूर्य इन दस योगों में मनुष्य गंगा स्नान करके पापों से छूट जाता है।












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